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Thursday, May 12, 2016

ऐसा भी धन किस काम का...?

          अपने रोजमर्रा के जीवन में हम ऐसे कई महारथियों से मिलते हैं जो कार्यकारी घंटों में लाखों रु. रोजाना के लेन-देन में व्यापार करते हैं, चुटकियों में करोड, दो करोड रु. इन्वेस्ट कर सकने की बात करते हैं और निश्चित रुप से वो ये बातें कोई गपबाजी के रुप में नहीं बल्कि पूरी गंभीरता से करते दिखाई देते हैं । उनकी हैसियत का प्रमाण उनके घरों में मौजूद लाखों रु. मूल्य की गाडियां, अपने वयस्क बच्चों के मनोविनोद हेतु लाख दो लाख रु. के मोबाईल व लेपटॉप जैसे आधुनिक उपकरण उन्हें हँसते-हँसते दिलवा देने के साथ ही उनके घूमने-फिरने के लिये वर्ष में तीन-चार बार हजारों-हजार रुपये राजी से या ना राजी से खर्च कर देने में भी दिखाई देता है । यदि कभी उनके घरों में वैवाहिक आयोजन हो तो चाहे पूरी चतुराई से ही सही किंतु लाखों रुपये भोज व विवाह व्यवस्था में व यदि कभी मकान बन रहा हो तो उतनी ही चतुराई से लाखों रुपये फर्श, इलेक्ट्रिसिटी, फर्नीचर व इनॉगरेशन जैसी व्यवस्थाओं में भी खर्च करते ये दिख जाते हैं । निःसंदेह इन जगहों पर की जाने वाली उनकी चतुराई की हम आलोचना नहीं कर सकते क्योंकि हममें से जो भी उस स्थान पर होगा वह अपने खर्च हो रहे पैसे का सवाया नहीं तो पूरा-पूरा मूल्य अवश्य हासिल करना चाहेगा ।
          किंतु आश्चर्य तब होता है जब वे ही श्रीमंत अपने उच्च स्तरीय आराम-तलब जीवनशैली,  गलत खान-पान या अपनी लाईफ-स्टाईल में ऐसी ही कमियों या गल्तियों के कारण स्वयं, पत्नी, भाई, पिता जैसे संबंधों के मध्य जब पथरी, घुटने या जोडों की स्थाई समस्या, खूनी पॉईल्स (मस्से) या इन जैसी चिपकू बीमारियों की गिरफ्त में आते हैं तो समस्या के स्थायी समाधान के नाम पर कुछ सौ या हजार रुपये जैसे जरुरी खर्च करने से भी न सिर्फ निरन्तर बचने की कोशिश करते दिखते हैं बल्कि मुफ्त उपचार का कोई जादुई फार्मूला ढूंढने में निरन्तर लगे रहते हैं और न सिर्फ दुःख पाते रहते हैं बल्कि समस्या को अन्दर ही अन्दर बढवाते चले जाते हैं । उस पर तुर्रा यह कि मुफ्त उपचार के तरीके यदि मिल भी जावें तो वहाँ भी पूरी निष्ठा से उस पर अडिग रहकर उपचार की निरंतरता बनाये रखें बगैर तुरत-फुरत उस विधा को नकार देते हुए फिर दूसरे किसी मुफ्त के चमत्कारिक फार्मूले ढूँढने में लग जाते हैं । ऐसा ही व्यवहार ये अपने यहाँ कार्यरत सेवकों (नौकरों) के मसले पर भी दिखाते रहते हैं जहाँ कम-से-कम वेतन देकर ज्यादा से ज्यादा समय उन्हें काम में लगाये रखना और हमेशा इस बात का ध्यान रखना कि वर्किंग अवर्स में कुछ समय भी वो फ्री बैठा न दिख जाए नतीजतन वर्ष में तीन-चार बार नये-नये नौकरों को उनके कार्यालय  में आते और असंतुष्टावस्था में जल्दी से जल्दी वहाँ से विदा हो जाते देखने में दिखाई देता है । आधी बार उन नौकरों के बगैर दुःख तो ये पा लेंगे किंतु आवश्यक रुप से पर्याप्त वेतन व फुरसत के थोडे भी कुछ पल उन्हें लेते देख पाना इन्हें गवारा नहीं दिखता ।
           हर समय अपने मिलने-जुलने वालों से एक जैसी बीमारी की निरंतर चर्चा करते रहना इस बात को भी प्रमाणित करता है कि समस्या तो न सिर्फ है, बल्कि निरन्तर बैचेन व दुःखी भी इन्हें बनाये हुए है किंतु यहाँ आकर उपचार के नाम पर आवश्यक पैसे  चमडी जाये पर दमडी न जाये वाली शैली में खर्च ये नहीं कर सकते फिर तकलीफ चाहे जैसी व जितनी भी क्यों न हो व्यवस्थित उपचार हेतु आवश्यक पैसा तो इनके पास से छूटते नहीं दिखता ।
          निःसंदेह इस जैसी हैसियत के लोग कभी भी और कहीं भी 50-55 वर्ष से कम उम्र के तो हो नहीं सकते । मनुष्य का सामान्य जीवन यदि 70-75 या 80 वर्ष भी आंक लिया जावे तो जहाँ सामान्य हैसियत के लोग कर्ज लेकर भी उपचार करवा लेने को तैयार दिखाई देते हैं वहीं इनके जैसे श्रीसम्पन्न लोग  ऐसी आवश्यक मद पर जरुरी रकम कभी भी और कितनी भी बार खर्च कर सकने जैसी बेहतर आर्थिक स्थिति में होने के बावजूद भी उस पैसे को बचाते चले जाने और परिवार सहित दुःख पाते हुए जीते चले जाने के क्रम को इस शैली में निभाते दिखते हैं जैसे आगे के जीवन में इन्होंने पैसा तो अब कमा पाना नहीं है और जिंदगी इसी पैसे में 150-200 साल से भी ज्यादा जीना है ।
            जीवन को तो उसके सामान्य समय पर खत्म हो ही जाना है और ये सारा सब-कुछ तब यहीं अगली पीढी के पास उनके कमाए बगैर ही जाना है । इधर उपर जाने पर यमराज भी इनसे कह सकते हैं कि भैया जब तुम्हें पृथ्वी पर स्वर्ग जैसी जिंदगी जीने का मौका हमने दिया था और तुम वहाँ नर्क जैसा जीवन जीते हुए ही यहाँ आए हो तो बेहतर है कि अब तुम नर्क में ही रहो क्योंकि यहाँ भी यदि मैंने तुम्हें स्वर्ग में भेज दिया तो रहोगे तो तुम अपनी आदत के मुताबिक नर्क जैसी शैली में ही और वहाँ का माहौल भी खराब ही करोगे तो बेहतर है तुम वहीं जाकर रहो जहाँ रहने की तुम्हारी आदत व फितरत है ।
          दूसरी ओर अगली पीढी को जितनी ज्यादा मात्रा में बगैर कमाया धन मिल जावेगा तो वह उन्हें पारिवारिक संस्कार के चलते व्यसनी भले ही न बनावे किंतु लम्बे समय तक अकर्मण्य व निखट्टू तो निश्चित रुप से बना ही देगा । फिर यदि अधेडावस्था में किस्मत अथवा परिस्थिति की मार के चलते कभी ये आर्थिक संकट में आये तो आदत व अनुभव की सीमितता में तब इन्हें भी समाधान कम व परेशानी ज्यादा ही उठानी पडेगी । तो इस लोक और परलोक दोनों ही स्थानों पर हम साधन संम्पन्न होने के बावजूद भी दुःख पाते हुए ही यदि जिएँ तो फिर यह सोचने में क्यों नहीं आना चाहिये कि आखिर किस काम का ऐसा धन ?
जबकि हमारे पुरखों के मतानुसार - पूत सपूत तो क्यों धन संचय,
                                        
और    पूत कपूत तो क्यों धन संचय ।
               
का सिद्धांत हमारी अगली पीढी के लिये पूर्णतः माकूल अवस्था में  सदियों से हर जगह और हमेशा ही देखने में आता रहा है । 
          तो क्यों न हमें रुककर यह अवश्य सोचना चाहिये कि यदि हमारे पास पर्याप्त सम्पन्नता है और हम उसे अपने ही शरीर के पोषण व संरक्षण पर भी खर्च नहीं कर पा रहे हैं तो आखिर उस सम्पन्नता के होने का औचित्य क्या है  ?