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Monday, February 13, 2017

सरकारी योजनाओं का सच...!


 
         एक रियल घटना पान की दुकान पर खडे एक 36-37 वर्षीय युवक से बातचीत के कुछ अंश...

          मैनें पूछा कुछ कमाते धमाते क्यों नहीं ?

          वह बोला--  क्यों ?😳

          मैं बोला--  शादी कर लो  ?

          वह बोला-- पहले ही हो गई ...😊

          मैं बोला--  कैसे  ?

          वह बोला--  मुख्यमंत्री कन्यादान योजना से...😊

          मैं बोला--  फिर बाल-बच्चों के लिये कमाओ  ?

          वह बोला--  जननी सुरक्षा से डिलिवरी फ्री और साथ मे 1400 रू का चेक...😊

          मैं बोला--  बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के लिये कमाओ  ?

          वह बोला--  उनके लिये पढ़ाई, यूनिफार्म, किताबें और भोजन सब सरकार की तरफ़ से फ्री  ! साथ में लड़का कॉलेज जा रहा है, BPL होने की वजह से उसे स्कॉलरशिप भी मिलती है,  हम उस से ऐश करते हैं ।

          मैं बोला-- यार घर कैसे चलाते हो  ?
 
        वह बोला- छोटी लड़की को सरकार से साईकिल मिली है, लड़के को लेपटॉप मिला है । माँ-बाप को वृद्धावस्था पेन्शन मिलती है, और 1 रूपये किलो गेहूं और चावल भी तो मिलता है ।

          मैं झुंझला कर बोला-  यार माँ-बाप को तीर्थयात्रा के लिये तो कमाओ  ?

          वह बोला-  दो धाम करवा दिये हैं, मुख्यमंत्री तीर्थ यात्रा से...😊

          मुझे गुस्सा आया और मैं बोला--
 
          माॅ बाप के मरने के बाद उनके क्रिया-कर्म के लिये तो  कमा  ?

          वह बोला--  1 रू में विद्युत शवदाह गृह है !😊

          मैंने कहा--  अपने बच्चों की शादी के लिये तो कमा..?

          वह मुस्कुराया और बोला-- फिर वहीं आ गये... वैसे ही होगी जैसे मेरी हुई थी !😀

          यार एक बात बता ये- इतने अच्छे कपड़े तू कैसे पहनता है ?

          वह बोला-- राज की बात है.. फिर भी मैं बता देता हूँ...😊

          "सरकारी जमीन पर कब्जा करो, आवास योजना मे लोन लो और फिर औने-पौने में मकान बेच कर फिर से जमीन कब्जा कर पट्टा ले लो !"😜
 
          तुम जैसे लाखों लोग काम करके हमारे लिए टैक्स भर ही रहे हैं ।  किसान भी मेहनत से खेती करके अनाज पैदा करता है और सरकार उनसे लेकर हमें मुफ़्त भी देती है, तो फिर हम काम क्यों करें ।
 
          बस यही है बेसहारा कहे जाने वाले निम्न वर्ग के लिये सरकारी रियायती योजनाओं का सच...! 
 
सोर्स : What'sApp.
 
 

Tuesday, August 16, 2016

कूडे का ट्रक (गार्बेज)

           एक दिन एक व्यक्ति ऑटो से रेलवे स्टेशन जा रहा था। ऑटो वाला बड़े आराम से ऑटो चला रहा था। एक कार अचानक ही पार्किंग से निकलकर रोड पर आ गयी। ऑटो चालक ने तेजी से ब्रेक लगाया और कार, ऑटो से टकराते टकराते बची। कार चालक गुस्से में ऑटो वाले को ही भला-बुरा कहने लगा जबकि गलती कार- चालक की थी । 

           ऑटो चालक एक सत्संगी (सकारात्मक विचार सुनने-सुनाने वाला) था । उसने कार वाले की बातों पर गुस्सा नहीं किया और क्षमा माँगते  हुए आगे बढ़ गया । 


           ऑटो में बैठे व्यक्ति को कार वाले की हरकत पर गुस्सा आ रहा था और उसने ऑटो वाले से पूछा तुमने उस कार वाले को बिना कुछ कहे ऐसे ही क्यों जाने दिया । उसने तुम्हें भला-बुरा कहा जबकि गलती तो उसकी थी। हमारी किस्मत अच्छी है,  नहीं तो उसकी वजह से हम अभी अस्पताल में होते ।


           ऑटो वाले ने कहा साहब बहुत से लोग गार्बेज ट्रक (कूड़े का ट्रक) की तरह होते हैं । वे बहुत सारा कूड़ा अपने दिमाग में भरे हुए चलते हैं । जिन चीजों की जीवन में कोई ज़रूरत नहीं होती उनको मेहनत करके जोड़ते रहते हैं  जैसे क्रोध, घृणा, चिंता, निराशा आदि । जब उनके दिमाग में इनका कूड़ा बहुत अधिक हो जाता है तो वे अपना बोझ हल्का करने के लिए इसे दूसरों पर फेंकने का मौका ढूँढ़ने लगते हैं । 


           इसलिए मैं ऐसे लोगों से दूरी बनाए रखता हूँ और उन्हें दूर से ही मुस्कराकर अलविदा कह देता हूँ । क्योंकि अगर उन जैसे लोगों द्वारा गिराया हुआ कूड़ा मैंने स्वीकार कर लिया तो मैं भी एक कूड़े का ट्रक बन जाऊँगा और अपने साथ साथ आसपास के लोगों पर भी वह कूड़ा गिराता रहूँगा । 


           मैं सोचता हूँ जिंदगी बहुत ख़ूबसूरत है इसलिए जो हमसे अच्छा व्यवहार करते हैं उन्हें धन्यवाद कहो और जो हमसे अच्छा व्यवहार नहीं करते उन्हें मुस्कुराकर माफ़ कर दो । हमें यह याद रखना चाहिए कि सभी मानसिक रोगी केवल अस्पताल में ही नहीं रहते हैं । कुछ हमारे आस-पास खुले में भी घूमते रहते हैं ।

 
           प्रकृति के नियम: यदि खेत में बीज न डाले जाएँ तो कुदरत उसे घास-फूस से भर देती है । उसी तरह से यदि दिमाग में सकारात्मक विचार न भरें जाएँ तो नकारात्मक विचार अपनी जगह बना ही लेते हैं और दूसरा नियम है कि जिसके पास जो होता है वह वही बाँटता है। "सुखी" सुख बाँटता है, "दु:खी" दुःख बाँटता है, "ज्ञानी" ज्ञान बाँटता है, भ्रमित भ्रम बाँटता है, और "भयभीत" भय बाँटता है । जो खुद डरा हुआ है वह औरों को डराता है, दबा हुआ दबाता है ,चमका हुआ चमकाता है, जबकि सफल इंसान सफलता बाँटता है ।



Monday, August 1, 2016

अनमोल रिश्ता...


            सुश्री वसुंधरा दीदी एक छोटे से शहर के  प्राथमिक स्कूल में  कक्षा 5 की शिक्षिका थीं । उनकी एक आदत थी कि वह कक्षा शुरू करने से पहले हमेशा "आई लव यू ऑल" बोला करतीं । मगर वह जानती थीं कि वह सच नहीं कहती । वह कक्षा के सभी बच्चों से उतना प्यार नहीं करती थीं । कक्षा में एक ऐसा बच्चा था जो वसुंधरा को एक आंख नहीं भाता । उसका नाम आशीष था । आशीष मैली कुचैली स्थिति में  स्कूल आ जाया करता । उसके बाल खराब होते, जूतों के बन्ध खुले, शर्ट के कॉलर पर मेल के निशान । व्याख्यान के दौरान भी उसका ध्यान कहीं और होता । वसुंधरा के डाँटने पर वह चौंक कर उन्हें देखने तो लग जाता.. मगर उसकी खाली-खाली नज़रों से उन्हें साफ पता लगता रहता कि आशीष शारीरिक रूप से कक्षा में उपस्थित होने के बावजूद भी मानसिक रूप से गायब है ।
           
            धीरे  धीरे वसुंधरा को आशीष से नफरत सी होने लगी । क्लास में घुसते ही आशीष.. वसुंधरा की आलोचना का निशाना बनने लगा । सब बुराई के उदाहरण आशीष के नाम पर किये जाते । बच्चे उस पर खिलखिला कर हंसते और वसुंधरा उसको अपमानित करके संतोष प्राप्त करतीं । आशीष ने हालांकि किसी बात का कभी कोई जवाब नहीं दिया । किन्तु वसुंधरा को वह एक बेजान पत्थर की तरह लगता जिसके अंदर अहसास जैसी कोई चीज नहीं थी । प्रत्येक डांट, व्यंग्य और सजा के जवाब में वह बस अपनी भावनाओं से खाली नज़रों से उन्हें देखता और सिर झुका लेता ।

            वसुंधरा को अब इससे गंभीर चिढ़ हो चुकी थी । पहला सेमेस्टर समाप्त हो गया और रिपोर्ट बनाने का चरण आया तो वसुंधरा ने आशीष की प्रगति रिपोर्ट में यह सब बुरी बातें लिख मारी । प्रगति रिपोर्ट कार्ड माता-पिता को दिखाने से पहले प्रधानाध्यापिका के पास जाया करता था । उन्होंने जब आशीष की रिपोर्ट देखी तो वसुंधरा को बुला लिया । 

            "वसुंधरा... प्रगति रिपोर्ट में कुछ तो प्रगति भी लिखनी चाहिए। आपने तो जो कुछ लिखा है इससे आशीष के पिता बिल्कुल निराश ही हो जाएंगे।"        मैं माफी चाहती हूँ, लेकिन आशीष एक बिल्कुल ही अशिष्ट और निकम्मा बच्चा है । मुझे नहीं लगता कि मैं उसकी प्रगति के बारे में कुछ भी अच्छा लिख सकती हूँ । वसुंधरा बेहद घृणित लहजे में बोलकर वहां से उठ आईं ।

            प्रधानाध्यापिका ने एक अजीब हरकत की । उन्होंने चपरासी के  हाथ वसुंधरा की डेस्क पर आशीष की पिछले वर्षों की प्रगति रिपोर्ट रखवा दी । अगले दिन वसुंधरा ने कक्षा में प्रवेश किया तो रिपोर्ट पर नजर पड़ी । पलट कर देखा तो पता लगा कि यह आशीष की रिपोर्ट हैं । "पिछली कक्षाओं में भी उसने निश्चय ही यही गुल खिलाए होंगे ।"  उन्होंने सोचा और कक्षा 3 की रिपोर्ट खोली । रिपोर्ट में टिप्पणी पढ़कर उनकी आश्चर्य की कोई सीमा न रही जब उन्होंने देखा कि रिपोर्ट उसकी तारीफों से भरी पड़ी है । "आशीष जैसा बुद्धिमान बच्चा मैंने आज तक नहीं देखा ।" "बेहद संवेदनशील बच्चा है और अपने मित्रों और शिक्षकों से बेहद लगाव रखता है ।" अंतिम सेमेस्टर में भी आशीष ने प्रथम स्थान प्राप्त कर लिया है ।

            "वसुंधरा दीदी ने अनिश्चित स्थिति में कक्षा 4 की रिपोर्ट खोली । "आशीष पर अपनी मां की बीमारी का बेहद प्रभाव पड रहा है ।  उसका  ध्यान पढ़ाई से हट रहा है ।"  "आशीष की माँ को अंतिम चरण का  कैंसर हुआ है । घर पर उसका और कोई ध्यान रखनेवाला नहीं है, जिसका गहरा प्रभाव उसकी पढ़ाई पर पड़ा है ।"  आशीष की  माँ मर चुकी है और इसके साथ ही आशीष के जीवन की रमक और रौनक  भी । उसे बचाना होगा...इससे पहले कि  बहुत देर हो जाए । 

            "वसुंधरा के दिमाग पर भयानक बोझ तारी हो गया । कांपते हाथों से उन्होंने प्रगति रिपोर्ट बंद की । आंसू उनकी आँखों से एक के बाद एक गिरने लगे । अगले दिन जब वसुंधरा कक्षा में दाख़िल हुईं तो उन्होंने अपनी आदत के अनुसार अपना पारंपरिक वाक्यांश "आई लव यू ऑल" दोहराया । मगर वह जानती थीं कि वह आज भी झूठ बोल रही हैं । क्योंकि इसी क्लास में बैठे एक उलझे बालों वाले बच्चे आशीष के लिए जो प्यार वह आज अपने दिल में महसूस कर रही थीं..वह कक्षा में बैठे और किसी भी बच्चे से हो ही नहीं सकता था । 

            व्याख्यान के दौरान उन्होंने रोजाना दिनचर्या की तरह एक सवाल आशीष पर दागा और हमेशा की तरह आशीष ने सिर झुका लिया । जब कुछ देर तक वसुंधरा से कोई डांट फटकार और सहपाठी सहयोगियों से हंसी की आवाज उसके कानों में न पड़ी तो उसने गहन आश्चर्य से सिर उठाकर उनकी ओर देखा । अप्रत्याशित रुप से
आज उनके माथे पर बल न थे बल्कि वह मुस्कुरा रही थीं । 

            उन्होंने आशीष को अपने पास बुलाया और उसे सवाल का जवाब बताकर दोहराने के लिए कहा । आशीष तीन चार बार के आग्रह के बाद अंतत: बोल ही पड़ा । इसके जवाब देते ही वसुंधरा ने न सिर्फ खुद खुशान्दाज़ होकर तालियाँ बजाईं बल्कि सभी से भी बजवायी.. फिर तो यह दिनचर्या बन गयी । वसुंधरा अब हर सवाल का जवाब अपने आप बताती और फिर उसके पिछले वर्षों के रेकार्ड के साथ उसकी खूब सराहना व तारीफ करतीं ।  क्लास में अ
ब प्रत्येक अच्छा उदाहरण आशीष के कारण दिया जाने लगा ।  धीरे-धीरे पुराना आशीष सन्नाटे की कब्र फाड़ कर बाहर आने लगा । 

            अब वसुंधरा को सवाल के साथ जवाब बताने की जरूरत नहीं पड़ती। वह रोज बिना किसी त्रुटि के उत्तर देकर सभी को प्रभावित करता और नये-नए सवाल पूछ कर सबको हैरान भी करता । उसके बाल अब कुछ हद तक सुधरे हुए होते, कपड़े भी काफी हद तक साफ होते जिन्हें शायद वह खुद धोने लगा था । देखते ही देखते साल समाप्त हो गया और आशीष ने दूसरा स्थान हासिल कर लिया यानी दूसरी क्लास । विदाई समारोह में सभी बच्चे वसुंधरा दीदी के लिये सुंदर उपहार लेकर आए और वसुंधरा की  टेबल पर ढेर लग गया । 

            इन खूबसूरती से पैक हुए उपहारों में  पुराने अखबार में बंद सलीके से पैक हुआ एक उपहार भी पड़ा था । बच्चे उसे देखकर हंस पड़े । किसी को जानने में देर न लगी कि उपहार के नाम पर ये आशीष लाया होगा । वसुंधरा दीदी ने उपहार के इस छोटे से पहाड़ में से लपक कर उसे निकाला । खोलकर देखा तो उसके अंदर एक महिलाओं की इत्र की आधी इस्तेमाल की हुई शीशी और एक हाथ में पहनने वाला एक कड़ा था जिसके ज्यादातर मोती झड़ चुके थे । वसुंधरा ने चुपचाप उस इत्र को खुद पर छिड़का और वह कंगन अपने हाथ में पहन लिया । सभी बच्चे यह दृश्य देखकर हैरान रह गए, खुद आशीष भी । आखिर आशीष से रहा न गया और वो वसुंधरा दीदी के पास आकर खड़ा हो गया । कुछ देर बाद उसने अटक-अटक कर वसुंधरा को बताया कि "आज आप में से मेरी माँ जैसी खुशबू आ रही है ।"

            समय पर लगाकर उड़ने लगा। दिन सप्ताह, सप्ताह महीने और महीने साल में बदलते भला कहां देर लगती है ? मगर हर साल के अंत में वसुंधरा को आशीष से एक पत्र नियमित रूप से प्राप्त होता जिसमें लिखा होता कि "इस साल कई नए टीचर्स से मिला । मगर आप जैसा कोई नहीं था ।" 
फिर आशीष का स्कूल समाप्त हो गया और पत्रों  का सिलसिला भी । कई साल आगे और गुज़रे और अध्यापिका वसुंधरा अब रिटायर हो गईं । 

            एक दिन उन्हें अपनी मेल में आशीष का पत्र मिला जिसमें लिखा था-  "इस महीने के अंत में मेरी शादी है और आपके बगैर शादी की बात मैं नहीं सोच सकता । एक और बात .. मैं जीवन में बहुत से लोगों से मिल चुका हूँ किंतु आप जैसा कोई नहीं है....डॉक्टर आशीष  । इसके साथ ही विमान का आने जाने का टिकट भी लिफाफे में मौजूद था । वसुंधरा खुद को रोक सकने की स्थिति में नहीं रह गई थी । 

           उन्होंने अपने पति से अनुमति ली और वह दूसरे शहर के लिए रवाना हो गईं । ऐन शादी के दिन जब वह शादी की जगह पहुंची तो थोड़ी लेट हो चुकी थीं । उन्हें लगा अब तक तो समारोह समाप्त हो चुका  होगा..  मगर यह देखकर उनके आश्चर्य की सीमा  न रही कि शहर के बड़े-बडे डॉ, बिजनेसमैन और यहां तक कि वहां मौजूद फेरे कराने वाले पंडित भी इन्तजार करते करते थक गये थे. कि आखिर कौन आना बाकी है...  मगर आशीष समारोह में फेरों और विवाह के  बजाय गेट की तरफ टकटकी लगाए उनके आने का इंतजार कर रहा था । फिर सबने देखा कि जैसे ही यह पुरानी अध्यापिका वसुंधरा ने गेट से प्रवेश किया आशीष उनकी ओर तेजी से लपका और उनका वह हाथ पकड़ा जिसमें उन्होंने अब तक वह सड़ा हुआ सा कंगन पहना हुआ था और उन्हें सीधा वेदी पर ले गया ।

            वसुंधरा का हाथ में पकड़ कर वह सभी मेहमानों से बोला "दोस्तो आप सभी हमेशा मुझसे मेरी माँ के बारे में पूछा करते थे और मैं आप सबसे वादा किया करता था कि जल्द ही आप सबको अपनी माँ से मिलाऊँगा...! यही मेरी माँ  हैं !"

मित्रों...
            इस सुंदर कहानी को सिर्फ शिक्षक और शिष्य के रिश्ते के कारण ही मत सोचिएगा,  अपने आसपास देखें, आशीष जैसे कई फूल मुरझा रहे हैं जिन्हें आप का जरा सा ध्यान, प्यार और स्नेह बिल्कुल नया जीवन भी दे सकता  है...!

Monday, July 18, 2016

खुशवंती सूत्र - परिपूर्ण जीवन यात्रा हेतु...


           इन  सूत्रों को पढ़ने के बाद पता चला कि सचमुच खुशहाल ज़िंदगी और शानदार मौत के लिए ये सूत्र बहुत ज़रूरी हैं... 
      
          1. अच्छा स्वास्थ्य - अगर आप पूरी तरह स्वस्थ नहीं हैं, तो आप कभी खुश नहीं रह सकते । बीमारी छोटी हो या बड़ी, ये आपकी खुशियां छीन लेती हैं। 

          2. ठीक ठाक बैंक बैलेंस - अच्छी ज़िंदगी जीने के लिए बहुत अमीर होना ज़रूरी नहीं । पर इतना पैसा बैंक में हो कि आप जब चाहें बाहर खाना खा पाएं, सिनेमा देख पाएं, समंदर और पहाड़ घूमने जा पाएं, तो आप खुश रह सकते हैं । उधारी में जीना आदमी को खुद की निगाहों में गिरा देता है ।

            3. अपना मकान - मकान चाहे छोटा हो या बड़ा, वो आपका अपना होना चाहिए । अगर उसमें छोटा सा बगीचा हो तो आपकी ज़िंदगी बेहद खुशहाल हो सकती है ।

              4. समझदार जीवन साथी - जिनकी ज़िंदगी में समझदार जीवन साथी होते हैं, जो एक-दूसरे को ठीक से समझते हैं, उनकी ज़िंदगी बेहद खुशहाल होती है, वर्ना ज़िंदगी में सबकुछ धरा का धरा रह जाता है, सारी खुशियां काफूर हो जाती हैं । हर वक्त कुढ़ते रहने से बेहतर है अपना अलग रास्ता चुन लेना ।

             5. दूसरों की उपलब्धियों से न जलना - कोई आपसे आगे निकल जाए, किसी के पास आपसे ज़्यादा पैसा हो जाए, तो उससे जले नहीं । दूसरों से खुद की तुलना करने से आपकी खुशियां खत्म होने लगती हैं । 

               6. गप से बचना - लोगों को गपशप के ज़रिए अपने पर हावी मत होने दीजिए । जब तक आप उनसे छुटकारा पाएंगे, आप बहुत थक चुके होंगे और दूसरों की चुगली - निंदा से आपके दिमाग में कहीं न कहीं ज़हर भर चुका होगा । 

                7.  अच्छी आदत - कोई न कोई ऐसी हॉबी विकसित करें, जिसे करने में आपको मज़ा आता हो, मसलन गार्डेनिंग, पढ़ना, लिखना । फालतू बातों में समय बर्बाद करना ज़िंदगी के साथ किया जाने वाला सबसे बड़ा अपराध है । कुछ न कुछ ऐसा करना चाहिए, जिससे आपको खुशी मिले और उसे आप अपनी आदत में शुमार करके नियमित रूप से करते रह सकें ।

               8. ध्यान - रोज सुबह कम से कम दस मिनट ध्यान करना चाहिए । ये दस मिनट आपको अपने ऊपर खर्च करने चाहिए । इसी तरह शाम को भी कुछ वक्त अपने साथ गुजारें । इस तरह आप खुद को जान पाएंगे । 

               9. क्रोध से बचना - कभी अपना गुस्सा ज़ाहिर न करें । जब कभी आपको लगे कि आपका दोस्त आपके साथ तल्ख हो रहा है, तो आप उस वक्त उससे दूर हो जाएं, बजाय इसके कि वहीं उसका हिसाब-किताब करने पर आमदा हो जाएं ।

              10. अंतिम समय - जब यमराज दस्तक दें, तो बिना किसी दु:ख, शोक या अफसोस के उनके साथ निकल पड़ना चाहिए, अंतिम यात्रा पर खुशी-खुशी,  शोक,  मोह के बंधन से मुक्त हो कर जो यहां से निकलता है,  उसी का जीवन सफल होता है ।

              मुझे नहीं पता कि खुशवंत सिंह ने पीएचडी की थी या नहीं ।  पर इन्हें पढ़ने के बाद लगता है कि ज़िंदगी के डॉक्टर भी होते हैं । ऐसे डॉक्टर ज़िंदगी बेहतर बनाने का फॉर्मूला देते हैं । ये ज़िंदगी के डॉक्टर की ओर से ज़िंदगी जीने के लिए दिए गए महत्वपूर्ण नुस्खे हैं ।


Tuesday, July 12, 2016

नशीला गोपनीय वार्तालाप...!


            एक बार विभिन्न श्रेणी के तीन लोग बैठ कर बातें कर रहे थे और बड़ी ही जोर-जोर से  हंस रहे थे - उन में से एक किसी मीडिया चैनल का मालिक था, दूसरा एक विदेशी था और तीसरा कोई एक नेता  था ।

            सब से पहले विदेशी बोला - यहाँ के लोग तो मूर्ख हैं,  हमारा कूड़ा खाते हैं, हमारे कुत्तो के साबुन से नहाते हैं ।  हमारे बनाये कीटनाशकों को कोल्डड्रिंक के रुप में अमृत समझ के पीते  हैं । इनकी ही गौमाता को मारकर हम मैग्गी, लेज और इस जैसे सभी सामानों में मिलाते  हैं और ये मूर्ख ब्रांडेड समझ के मजे से खा  जाते हैं ।  नीम की दातुन को  छुङवा के लगा दिया कोलगेट घिसने पर,  जो बनती है जानवरों की हड्डी पिसने पर । 

            दीवाली जैसे त्यौहारों पर  भी अब ये हमारी चाकलेट कुरकुरे खाते हैं और अपनी ही गौमाता  के  दूध में मिलावट  बताते हैं ।  हम यहाँ बैठ कर इनको अपने इशारे पे नचवाते हैं,  राम सेतु आदि यहां  बैठ के तुडवाते  हैं ।  यह जो थे कभी दुनिया के मालिक, आज नौकर इनको बना दिया,  आसमान  से पटक कर मिट्टी में इनको मिला  दिया ।  पर  इन मूर्खो को अभी भी अक्ल  नहीं आई । आज भी ब्रांडेड से नहाते  हैं, ब्रांडेड खाते हैं, ब्रांडेड चलाते हैं, ब्रांडेड पहनते हैं । हा... हा... हा...  पूरे कमरे में गूंज रही  ठहाको की  फुलवारी थी ।

            अब - "विदेशी" के बाद " नेता" की बारी थी । दारु का गिलास  उठा के नेता बोला  अरे मेरे विदेशी भाई तुमने हमको कम तोला । ये लोग तुम्हारे गुलाम न होते हम अगर तुम्हारे साथ न होते । इस सोने की चिड़िया को हमने ही रुलाया है । यहाँ का साम्राज्य हमने ही तुम्हें दिलाया है । तुमने तो सिर्फ पैसा और सामान ही दिया है, असली पागल  तो इनको  हमने किया है । कभी -  जात के नाम पर,  कभी -   धर्म  के नाम पर,  हमने ही -  भाई को भाई से लड़ाया है । हम यहाँ सब-कुछ निचोड़ कर बिकवा  देंगे, तुम इत्मीनान रखना, बस पैसा कम न होने पाये, मेरे स्विस खाते  का ख्याल  रखना ।

            इसी बीच "मीडिया वाला" चिल्लाया - तोड़ दारु की बोतल  जोर से बङबङाया - अरे ! तुम दोनों कुछ भी न होते,  अगर तुम्हारे साथ हम न होते ? तुम्हारी हर ओछी हरकत हम छुपाते  हैं, पकड़े हुए किसी बेकसूर को, ज़ालिम-ज़ालिम कहकर चिल्लाते हैं । ब्रांडेड आपके इसलिए बिकते  हैं  क्योंकि हर ब्रेक  में हमारे ये दिखते  हैं ।  विदेशी सामान का असली सच  हम दिखाते नहीं हैं,  इसलिए -  अच्छे स्वदेशी प्रॉडक्ट भी टिक पाते  नहीं  हैं, लोगों को मतिभ्रम में हम -  फंसा रहे हैं  । इसीलिए -  आप सबको मुर्ख बना रहे हैं । हर चैनल, हर एंकर यहाँ बिकता  है । इसीलिए -  सुबह 6 बजे से हर जगह विदेशी प्रॉडक्ट दिखता है । अगर सिर्फ 24 घंटे हम ईमांनदारी से खबरें चला दें तो तुम्हें एक ही दिन में जेल  भिजवा दें...

            उपरोक्त स्थिति में सब हों या न हों किंतु इन माध्यमों में अधिकांश तो ऐसे ही  हैं । आपका क्या ख्याल है  ?
 मूल रचना सोर्स : WhatsApp.
  

Saturday, July 9, 2016

सामान्य मानव अधिकार से जुडी उपयोगी जानकारी...


            आप कोई भी हो – आप कुछ भी हो – ये 5 बातें जानना आपके लिए बहुत जरूरी है-

            बहोत सी ऐसी बातें- जिन्हें प्रायः हम ज़िंदगी में महत्व नहीं देते... “जाने दो, छोड़ो, बाद में देख लेंगे, हमें क्या करना है…” जैसे शब्दों का प्रयोग करके बातें भूल जाया करते है और ज़िंदगी में आगे बढ़ जाते है । लेकिन क्या आप जानते है– हमारे देश में सामान्य मानव अधिकार से जुडे इन मुद्दों की कानूनन कुछ ऐसी हकीक़तें हैं, जिसकी जानकारी हमारे पास नहीं होने के कारण  हम समय आने पर अपने सामान्य अधिकारों से वंचित रह जाते है ।

            जानिये  5 ऐसे सामान्य अधिकारों के बारे में, जो हममें से किसी के भी जीवन में कभी भी उपयोगी हो सकती है-

1.  शाम के वक्त महिलाओं की गिरफ्तारी नहीं हो सकती-
            कोड ऑफ़ क्रिमिनल प्रोसीजर, सेक्शन 46 के तहत शाम 6 बजे के बाद और सुबह 6 के पहले भारतीय पुलिस किसी भी महिला को गिरफ्तार नहीं कर सकती, फिर चाहे गुनाह कितना भी संगीन क्यों ना हो. अगर पुलिस ऐसा करते हुए पाई जाती है तो गिरफ्तार करने वाले पुलिस अधिकारी के खिलाफ शिकायत (मामला) दर्ज की जा सकती है. इससे उस पुलिस अधिकारी की नौकरी खतरे में आ सकती है ।

2. गेस सिलेंडर फटने से जान-माल के नुकसान पर 40 लाख रूपये तक का बीमा कवर क्लेम कर सकते है-
 
            पब्लिक लायबिलिटी पॉलिसी के तहत अगर किसी कारण आपके घर में सिलेंडर फट जाता है और आपको जान-माल का नुकसान झेलना पड़ता है तो आप तुरंत गैस कंपनी से बीमा कवर क्लेम कर सकते हैं. आपको बता दे कि गैस कंपनी से 40 लाख रूपये तक का बीमा क्लेम कराया जा सकता है. अगर कंपनी आपका क्लेम देने से मना करती है या टालती है तो इसकी शिकायत की जा सकती है. दोषी पाये जाने पर गैस कंपनी का लायसेंस रद्द हो सकता है ।

            3. कोई भी हॉटेल चाहे वो 5 स्टार ही क्यों ना हो… आप फ्री में पानी पी सकते है और वाश रूम इस्तमाल कर सकते हैं-

            इंडियन सीरीज एक्ट, 1887 के अनुसार आप देश के किसी भी हॉटेल में जाकर पानी मांगकर पी सकते है और उस हॉटल का वाश रूम भी इस्तेमाल कर सकते हैं. हॉटेल छोटा हो या 5 स्टार, वो आपको रोक नही सकते. अगर हॉटेल का मालिक या कोई कर्मचारी आपको पानी पिलाने से या वाश रूम इस्तमाल करने से रोकता है तो आप उन पर कारवाई  कर सकते है. आपकी शिकायत से उस हॉटेल का लायसेंस रद्द हो सकता है ।

4. गर्भवती महिलाओं को नौकरी से नहीं निकला जा सकता-
            मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट 1961 के मुताबिक़ गर्भवती महिलाओं को अचानक नौकरी से नहीं निकाला जा सकता. मालिक को पहले तीन महीने की नोटिस देनी होगी और प्रेगनेंसी के दौरान लगने वाले खर्चे का कुछ हिस्सा देना होगा. अगर वो ऐसा नहीं करता है तो  उसके खिलाफ सरकारी रोज़गार संघटना में शिकायत कराई जा सकती है. इस शिकायत से कंपनी बंद हो सकती है या कंपनी को जुर्माना भरना पड़ सकता है ।

5. पुलिस अफसर आपकी शिकायत लिखने से मना नहीं कर सकता-
            आईपीसी के सेक्शन 166ए के अनुसार कोई भी पुलिस अधिकारी आपकी कोई भी शिकायत दर्ज करने से इंकार नही कर सकता. अगर वो ऐसा करता है तो उसके खिलाफ वरिष्ठ पुलिस दफ्तर में शिकायत दर्ज कराई जा सकती है. अगर वो पुलिस अफसर दोषी पाया जाता है तो उसे कम से कम 6 महीने से लेकर 1  साल तक की जेल हो सकती है या फिर उसे अपनी नौकरी गंवानी पड़ सकती है ।

            इन रोचक फैक्ट्स को  आप तक WhatsApp के द्वारा मोबाईल to मोबाईल आगे बढाया जा रहा है ।  इन आवश्यक तथ्यों को आगे के लिये भी अपने ध्यान मैं रखना, हर किसी के लिये उपयोगी ही रहेगा क्योंकि हमारे सामान्य अधिकारों के रुप में ये किसी के भी जीवन में कभी भी किसी महत्वपूर्ण अवसर पर काम में आ सकते हैं ।

जानकारी सौजन्य :  WhatsApp

Wednesday, July 6, 2016

मेरे स्नेही मित्रो...


            सेवा के इस अनूठे आयोजन से खुद को जोडें । वर्तमान के मोसमी फल जैसे आम, जामुन, चिकू इत्यादी जिनका हममे से कोई भी उपयोग करने के बाद कृपया इनके बीज फेंके नही, बल्कि इन्हें पानी से धोकर एक प्लास्टीक की थैली में रखते चलें और जब भी आप शहर से बाहर जावें- तब जहां भी सूखी बंजर भूमि दिखे वहीं पर इन बीजों को फेंकें, अथवा सडक के ऐसे ही किसी किनारे पर फेंकें । यदि हमारे इस सुकृत्य से एक बीज भी पनप कर पेड बन जाता है तो समझें हमारा उद्देश्य सफल हो गया । यह किसी अकेले व्यक्ति का विचार नही हे बल्कि महाराष्ट्र और कर्नाटक मे बहुत से लोग इस अद्भुत मिशन से जुडे हैं । आज सुबह ही एक लेख पढने के पश्चात ऐसा लगा कि क्यों  न  हम सभी साथी इस मिशन से जुडें एवम् इसे अपनी एक आदत बनालें । इसके अलावा...

 जिस दिन भी हम मरेंगे...अपने साथ एक पेड़ भी लेकर जलेंगे
 इसलिये प्रकृति का जो कर्ज रहेगा हम पर  वो तो चुका दो यारों...
जीते जी दो पेड़ तो लगा दो यारों...!

            आप सबसे निवेदन है, यह मैसेज सिर्फ तीन से पांच लोगों तक जरूर भेजें... और उन लोगों से भी कहें कि यह मैसेज आगे तीन से पांच लोगों को भेजें, हम सब बलिदान ना सही पर देश के लिए इतना छोटा सा काम तो कर ही सकते है,,,

1. कचरा सड़क पर ना फेंकें ।
2. सड़कों, दीवारों पे ना थूकें ।
3. नोटों, दीवारों पर ना लिखें ।
4. गाली देना छोड़ दें ।
5. पानी एवम् लाइट बचाएँ ।
6. एक पौधा लगाएँ ।
7. ट्रेफिक रूल्स ना तोडें ।
8. रोज़ माता पिता का आशीर्वाद लें ।
9. लड़कियों की इज्जत करें ।
10. एम्बुलेंस को रास्ता दें ।

देश को नहीं, पहले खुद को बदलें । 

            यदि हम चाहते हैं कि हमारी संतानों को आने वाले समय में रहने को साफ व सुरक्षित माहौल मिले तो हमें इन छोटे-छोटे नियमों को अनिवार्य रुप से अपनी आदत बना लेना चाहिये वर्ना कोई भी मोदी, गांधी अथवा केजरीवाल जैसे नेता भी अकेले कुछ सुधार नहीं कर पाएंगे जब तक कि इन छोट-छोटे सामान्य नियमों को हम सभी अपनी जीवनचर्या का आवश्यक अंग ना बना लें । धन्यवाद...

            A very humble request to all. Send this message at least to five persons and ask them to further send to Three to five persons and keep the chain going...

           1. Don't throw garbage on the roads/streets
           2. Don't spit on roads and walls
           3. Don't write on walls and currency notes
           4. Don't abuse and insult others
           5. Save water and electricity
           6. Plant a tree
           7. Follow traffic rules
       8. Take care of your parents n grand parents, take their blessings       &    always respect them
           9. Respect women
         10. Give way to ambulance

          We got to change ourselves and not the country. Once we change ourselves the country will automatically change,

           If we want our kids to live in a clean and safe environment then pledge to follow these in your everyday life.

           Whether it's Modi or Gandhi or Kejriwal no person or leader can change the country alone, it's you & me who can change our beloved nation by changing ourselves

          *   Kindly forward this important message to every single Friend or Group so that reaches to every citizen of India.
Thanks.  *
 



Sunday, July 3, 2016

असफलता V/s, सफलता...!


            5 वर्ष की उम्र में उसके पिता का निधन हो गया । 16 वर्ष की उम्र में उसका स्कूल छूट गया । 17 वर्ष की उम्र तक वह असंतुष्ट अवस्था में 4 बार जॉब बदल चुका था । 18 वर्ष की उम्र में उसकी शादी हो गई । 18 से 22 वर्ष की उम्र में उसने रेल्वे में कंडक्टर की नौकरी में फैल रहने के बाद सेना में नौकरी करने की कोशिश की और वहाँ से भी उसे निकाल दिया गया । उसने वकालत पास करने की कोशिश की वहाँ भी वह रिजेक्ट हुआ । फिर उसने इंश्योरेंस एजेंसी में प्रयास किया और वहाँ भी असफल ही साबित हुआ । 

            पारिवारिक जीवन में 19 वर्ष की उम्र में वह एक कन्या का पिता बना किंतु 20 वर्ष की उम्र में उसकी पत्नी उस कन्या को उसके पास छोडकर किसी अन्य पुरुष के साथ चली गई । उसने एक छोटे रेस्टोरेंट में कप-प्लेट धोने से शुरु करके कुक का काम किया । उसकी पुत्री का अपहरण हो गया और उसे भी वह बचा नहीं पाया । किंतु फिर भी संयोगवश उसने अपनी पत्नी को अपने साथ रहने के लिये राजी कर लिया ।

            65 वर्ष की उम्र में वह रिटायर हो गया और उसके रिटायरमेंट पर संस्थान ने उसके पास सिर्फ 105 डॉलर का चैक इस नोट के साथ भेजा कि इससे आगे व अधिक उसकी कोई पात्रता नहीं बनती । 

            थक-हारकर उसने आत्महत्या कर लेने का निर्णय किया । लगभग सारा जीवन हर जगह असफल रहने के कारण उसका जीवन के प्रति समस्त मोह भंग हो चुका था । उसने एक पेड के नीचे अपनी वसीयतनुमा ईच्छा लिखकर जब फांसी लगाने का प्रयास किया तब अचानक उसके मन में यह विचार आया कि जीवन में बहुत कुछ ऐसा है जो उसने अभी तक नहीं किया है । 

            अपने कुकिंग जॉब के दौरान वो यह महसूस करता था कि उसके बनाये हुए चिकन की रेसिपी को लोग पसन्द करते थे । तब उसने उस चेक को भुनवाकर 87 डॉलर इन्वेस्ट करते हुए कुछ चिकन के छोटे-छोटे पैकेट बनाकर केंचुकी फ्रॉयड चिकन के नाम से डोअर-टू-डोअर बेचने का काम फिर शुरु किया और इस बार उसे लोगों से धीरे-धीरे अच्छा प्रतिसाद मिलने लगा । 

            चलते-चलते जहाँ वह शख्स 65 वर्ष की उम्र में आत्महत्या करने को उद्धृत था वहीं 88 वर्ष की उम्र में कोलोनेल सेंडर्स का नाम फाउंडर ऑफ केंचुकी फ्रॉयड चिकन (KFC) के रुप में विश्व भर में बिलेनियर्स के रुप में स्थापित हो चुका था ।

            कथासार यही है कि जब तक जीवन है कोई भी व्यक्ति कभी भी कहीं भी नई शुरुआत कर सकता है । प्रयास कभी भी अंतिम नहीं होते । न ही यह बात मायने रखती है कि आपने उसके लिये कितनी कठोर मेहनत की । इंसान का काम है - चलते रहना, प्रयासरत रहना, वांछित परिणाम न मिलने पर तरीकों में बदलाव करते रहने के साथ पुनः-पुनः प्रयास करते रहना । लक्ष्य व स्वप्नपूर्ति के लिये कोई भी उम्र कभी भी अंतिम नहीं होती ।
 

Thursday, June 30, 2016

आरक्षण का दंश...

           
            एक सज्जन से एक सवाल पूछा गया कि भारत में जनरल कैटेगरी वाला होने पर आपका क्या अनुभव है तो उन्होंने जो जबाब दिया, उसे पढ़िए........(हिंदी में अनुवाद)

           प्रवेश परीक्षा:
         मेरा स्कोर :192, उसका स्कोर :92, जी हाँ हम एक ही कॉलेज में पढ़े.....

           College Fees,
         मेरी हर सेमिस्टर की फी 30200, (मेरे परिवार की आय 5 lacs से कम है..) उसकी हर सेमिस्टर की फी 6600. (उसके माता और पिता दोनों अच्छा कमा रहे हैं......) जी हाँ हम दोनों एक ही होस्टल में रहते थे...

          Mess Fees,
         मैं 15000/- हर सेमिस्टर के देता था.... वो भी 15000 हर सेमिस्टर के देता था, लेकिन सेमिस्टर के अंत में वो उसे रिफंड होते थे..... जी हाँ हम एक ही मेस में खाते थे....

          Pocket Money,
         मेरा खर्चा 5000 था जो कि मैं ट्यूशन और थोड़ा बहुत अपने पिता से लेता था... वो 10000 खर्चा करता था जो कि उसे स्कॉलरशिप के मिलते थे... जी हाँ हम एक साथ पार्टी करते थे....

          CAT 2015,
        मेरा स्कोर : 99 percentile. (किसी IIM से एक मिसकॉल का इंतज़ार रहा.) उसका स्कोर : 63 percentile. ( IIM Ahemedabad के लिए सलेक्ट हुआ) जी हाँ ऐप्टीट्यूड और रीजनिंग उसे मैंने पढ़ाया था....

          OIL Campus recruitement,
          मैं : Rejected. (My OGPA 8.1) वो : selected. (His OGPA 6.9) जी हाँ हमने एक ही कोर्स पढ़ा था...

          GATE Score,
       मेरा स्कोर : 39.66 (डिसक्वालीफाईड सो INR 1,68,000 की स्कॉलरशिप भी हाथ से गई) उसका स्कोर : 26 (क्वालीफाईड और INR 1,68,000 के साथ-साथ अतिरिक्त स्कॉलरशिप भी) जी हाँ हमने एक जैसे नोट्स शेयर किये थे..

            कौन हूँ मैं ? मैं भारत में एक जनरल कैटेगरी का छात्र हूँ...

            दिमाग में बस कुछ सवाल हैं.....

            क्या उसके पास चलने के लिए दो पैर नहीं हैं ? क्या उसके पास लिखने या काम करने के लिए दो हाथ नहीं हैं ? क्या उसके पास बोलने के लिए मुंह नहीं है ? क्या उसके पास सोचने के लिए दिमाग नहीं है ? अगर हैं तो फिर हम दोनों को एक जैसा ट्रीटमेंट क्यों नहीं मिलता ? 

          ये बात राजनितिक पार्टीयो के बजाय देश के सम्माननीय न्यायालय के सभी महानुभावों तक पहुंचे तब तक forward करे ताकि देश आरक्षण की दीमक से बरबाद होने से बच जाये ।

सोर्स - WhatsApp.
 

Saturday, June 25, 2016

सामर्थ्य - समय व धीरज की...


            एक साधु था, वह रोज घाट के किनारे बैठ कर चिल्लाया करता था, "जो चाहोगे सो पाओगे"  "जो चाहोगे सो पाओगे।"

            बहुत से लोग वहाँ से गुजरते थे पर कोई भी उसकी बात पर ध्यान नहीँ देता था सब उसे पागल समझते थे ।

             एक दिन एक युवक वहाँ से गुजरा और उसने उस साधु की आवाज सुनी-  "जो चाहोगे सो पाओगे"   "जो चाहोगे सो पाओगे।"

            वह आवाज सुनते ही उसके पास चला गया ।

            उसने साधु से पूछा - महाराज आप बोल रहे थे कि
"जो चाहोगे सो पाओगे" ।

            तो क्या आप मुझको वो दे सकते हो जो मैं जो चाहता हूँ ?

            साधु उसकी बात को सुनकर बोला –  हाँ बेटा तुम जो कुछ भी चाहते हो  उसे मैं तुम्हें जरुर दुँगा, बस तुम्हे मेरी बात माननी होगी । लेकिन उसके पहले ये बताओ कि तुम्हे आखिर चाहिये क्या ?

            युवक बोला-
"मेरी एक ही ख्वाहिश है, मैँ हीरों का बहुत बड़ा व्यापारी बनना चाहता हूँ ।"

            साधू बोला-
"कोई बात नहीँ, मैं तुम्हे एक हीरा और एक मोती देता हूँ, उससे तुम जितने भी हीरे मोती बनाना चाहोगे बना पाओगे ।"

            ऐसा कहते हुए साधु ने अपना हाथ आदमी की हथेली पर रखते हुए कहा- 
"पुत्र, मैं तुम्हे दुनिया का सबसे अनमोल हीरा दे रहा हूं, लोग इसे ‘समय’ कहते हैं, इसे तेजी से अपनी मुट्ठी में पकड़ लो और इसे कभी मत गंवाना,  तुम इससे जितने चाहो उतने हीरे बना सकते हो ।"

            युवक अभी कुछ सोच ही रहा था कि साधु उसकी दूसरी हथेली पकड़ते हुए बोला -
"पुत्र, इसे भी पकड़ो, यह दुनिया का सबसे कीमती मोती है, लोग इसे “धैर्य” कहते हैं, जब कभी समय देने के बावजूद परिणाम ना मिले, तो इस कीमती मोती को धारण कर लेना, याद रखना जिसके पास यह मोती है, वह दुनिया में कुछ भी प्राप्त कर सकता है ।"

            युवक गम्भीरता से साधु की बातों पर विचार करते हुए निश्चय करता है कि आज से वह कभी अपना समय बर्बाद नहीं करेगा और हमेशा धैर्य से काम लेगा । 

             ऐसा सोचकर वह हीरों के एक बहुत बड़े व्यापारी के यहाँ काम सीखते हुए करना शुरू करता है और अपने मेहनत और ईमानदारी के बल पर एक दिन खुद भी हीरों का बहुत बड़ा व्यापारी बन जाता है ।

            मित्रो- ‘समय’ और ‘धैर्य’ वह दो हीरे-मोती हैं जिनके बल पर हम बड़े से बड़ा लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं । अतः ज़रूरी है कि हम अपने कीमती समय को बर्वाद ना करें और अपनी मंज़िल तक पहुँचने के लिए हमेशा धैर्य से काम लें । हमारे बुजुर्गों ने भी अपने शब्दों में धीरज का महत्व हमें इस प्रकार समझाने का प्रयास किया है-


धीरे-धीरे  रे मना,  धीरे  सब  कुछ  होय,
माली सींचे सौ घडा, ऋुत आये फल होय ।

Wednesday, June 15, 2016

कर्मसूत्र...


            कुछ समय पूर्व एक युवक ने विवाह के दो साल बाद परदेस जाकर व्यापार करने की इच्छा पिता से कही । पिता ने स्वीकृति दी तो वह अपनी गर्भवती पत्नी को माँ-बाप के जिम्मे छोड़कर व्यापार करने चला गया । 

            परदेश में मेहनत से बहुत धन कमाया और वह धनी सेठ बन गया । सत्रह वर्ष धन कमाने में बीत गए तो सन्तुष्टि हुई और वापस घर लौटने की इच्छा हुई । पत्नी को पत्र लिखकर आने की सूचना दी और जहाज में बैठ गया । उसे जहाज में एक व्यक्ति मिला जो दुखी मन से बैठा था ।

            सेठ ने उसकी उदासी का कारण पूछा तो उसने बताया कि इस देश में ज्ञान की कोई कद्र नही है । मैं यहाँ ज्ञान के सूत्र बेचने आया था पर कोई लेने को तैयार नहीं है ।

            सेठ ने सोचा 'इस देश में मैने बहुत धन कमाया है, और यह मेरी कर्मभूमि है, इसका मान रखना चाहिए !' इसलिये उसने ज्ञान के सूत्र खरीदने की इच्छा जताई ।

            उस व्यक्ति ने कहा- मेरे हर ज्ञान सूत्र की कीमत 500 स्वर्ण मुद्राएं है । सेठ को सौदा तो महंगा लग रहा था.. लेकिन कर्मभूमि का मान रखने के लिए 500 स्वर्ण मुद्राएं दे दी । व्यक्ति ने ज्ञान का पहला सूत्र दिया- कोई भी कार्य करने से पहले दो मिनट रूककर सोच लेना । सेठ ने सूत्र अपनी किताब में लिख लिया । 

            कई दिनों की यात्रा के बाद रात्रि के समय सेठ अपने नगर को पहुँचा । उसने सोचा इतने सालों बाद घर लौटा हूँ तो क्यों न चुपके से बिना खबर दिए सीधे पत्नी के पास पहुँच कर उसे आश्चर्य उपहार दूँ ।

            घर के द्वारपालों को मौन रहने का इशारा करके सीधे अपने पत्नी के कक्ष में गया । तो वहाँ का नजारा देखकर उसके पांवों के नीचे की जमीन खिसक गई । पलंग पर उसकी पत्नी के पास एक अन्जान युवक सोया हुआ था । अत्यंत क्रोध में सोचने लगा कि मैं परदेस में भी इसकी चिंता करता रहा और ये यहां अन्य पुरुष के साथ है । दोनों को जिन्दा नही छोड़ूगाँ । क्रोध में तलवार निकाल ली ।

            वार करने ही जा रहा था कि उतने में ही उसे 500 स्वर्ण मुद्राओं से प्राप्त ज्ञान सूत्र याद आया- कि कोई भी कार्य करने से पहले दो मिनट सोच लेना । सोचने के लिए रूका । तलवार पीछे खींची तो एक बर्तन से टकरा गई । बर्तन गिरा तो पत्नी की नींद खुल गई । जैसे ही उसकी नजर अपने पति पर पड़ी वह भावविव्हल हो ख़ुशी में रो पडी और बोली- आपके बिना जीवन कितना सूना था, इन्तजार में इतने वर्ष कैसे निकाले यह मैं ही जानती हूँ ।

            सेठ तो पलंग पर सोए पुरुष को देखकर कुपित था । पत्नी ने युवक को उठाने के लिए कहा- बेटा जाग । तेरे पिता आए हैं । युवक उठकर जैसे ही पिता को प्रणाम करने झुका माथे की पगड़ी गिर गई और उसके लम्बे बाल बिखर गए ।  सेठ की पत्नी ने कहा- स्वामी ये आपकी बेटी है । पिता के बिना इसके मान को कोई आंच न आए, इसलिए मैंने इसे बचपन से ही पुत्र के समान पालन पोषण और संस्कार दिए हैं ।

            यह सुनकर सेठ की आँखों से अश्रुधारा बह निकली । पत्नी और बेटी को गले लगाकर वह सोचने लगा कि यदि आज मैने उस ज्ञानसूत्र को नहीं अपनाया होता तो जल्दबाजी में कितना अनर्थ हो जाता । मेरे ही हाथों मेरा निर्दोष परिवार खत्म हो जाता ।

            ज्ञान का यह सूत्र उस दिन तो मुझे बहुत महंगा लग रहा था, लेकिन ऐसे सूत्र के लिए तो 500 स्वर्ण मुद्राएं भी बहुत कम हैं । 'ज्ञान तो वास्तव में  अनमोल है ' ।

            इस कहानी का सार यह है कि जीवन के दो मिनट जो दुःखों से बचाकर सुख की बरसात कर सकते हैं. वे हैं - शातिं के । किसी भी व्यक्ति को क्रोध अथवा जल्दबाजी के आवेश में कुछ भी कर्म करने के पूर्व इस सूत्र को अवश्य ध्यान में रखना चाहिये ।   
               

Friday, May 20, 2016

ईच्छा भगवान की...


          एक बार भगवान से उनका सेवक कहता है, भगवान- आप एक जगह खड़े-खड़े थक गये होंगे, एक दिन के लिए मैं आपकी जगह मूर्ति बन कर खड़ा हो जाता हूं, आप मेरा रूप धारण कर घूम आएँ l

          भगवान मान जाते हैं, लेकिन शर्त रखते हैं कि जो भी लोग प्रार्थना करने आयें, तुम बस उनकी प्रार्थना सुन लेना कुछ बोलना नहीं । मैंने उन सभी के लिए प्लानिंग कर रखी है ।

          सेवक मान जाता है और परिवर्तनस्वरुप भगवान के स्थान पर खडा हो जाता है ।

          सबसे पहले मंदिर में बिजनेस मैन आता है और कहता है, भगवान मैंने एक नयी फैक्ट्री डाली है, उसे खूब सफल करना l वह माथा टेकता है, तो उसका पर्स नीचे गिर जाता है l वह बिना पर्स लिये ही चला जाता है ।

          सेवक बेचैन हो जाता है. वह सोचता है कि रोक कर उसे बताये कि पर्स गिर गया, लेकिन शर्त की वजह से वह नहीं कह पाता ।

          इसके बाद एक गरीब आदमी आता है और भगवान को कहता है कि घर में खाने को कुछ नहीं. भगवान मदद करो । तभी उसकी नजर पर्स पर पड़ती है. वह भगवान का शुक्रिया अदा करता है और पर्स लेकर चला जाता है ।

          अब तीसरा व्यक्ति आता है, वह नाविक होता है  । वह भगवान से कहता है कि मैं 15 दिनों के लिए जहाज लेकर समुद्र की यात्रा पर जा रहा हूं, यात्रा में कोई अड़चन न आये भगवान !

          तभी पीछे से बिजनेसमैन पुलिस के साथ आता है और कहता है कि मेरे बाद ये नाविक आया है l इसी ने मेरा पर्स चुरा लिया है, पुलिस नाविक को ले जा रही होती है तभी सेवक बोल पड़ता है । अब पुलिस सेवक के कहने पर उस गरीब आदमी को पकड़ कर जेल में बंद कर देती है । रात को भगवान आते हैं,  तो सेवक खुशी-खुशी पूरा किस्सा बताता है ।


          भगवान कहते हैं, तुमने किसी का काम बनाया नहीं, बल्कि बिगाड़ा है । वह व्यापारी गलत धंधे करता है, अगर उसका पर्स गिर भी गया, तो उसे फर्क नहीं पड़ने वाला था बल्कि इससे उसके पाप ही कम होते, क्योंकि वह पर्स गरीब इंसान को मिला था. पर्स मिलने पर उसके बच्चे भूखों नहीं मरते ।

          रही बात नाविक की, तो वह जिस यात्रा पर जा रहा था, वहां तूफान आनेवाला था, अगर वह जेल में रहता, तो जान बच जाती. उसकी पत्नी विधवा होने से बच जाती. तुमने सब गड़बड़ कर दी ।

          कई बार हमारी लाइफ में भी ऐसी प्रॉब्लम आती है, जब हमें लगता है कि ये मेरे साथ ही क्यों हुआ ।  लेकिन इसके पीछे भगवान की प्लानिंग होती है । जब भी कोई प्रॉब्लमन आये. उदास मत होना । इस कहानी को याद करना और सोचना कि जो भी होता है,  अच्छे के लिए ही होता है ।

मैंने प्रभु से मांगी शक्ति 
उन्होंने मुझे दी कठिनाईयां, हिम्मत बढाने के लिये.



मैंने प्रभु से मांगी बुद्धि
उन्होंने मुझे दी उलझनें, सुलझाने के लिये.


मैंने प्रभु से मांगी समृद्धि
उन्होंने मुझे दी समझ, काम करने के लिये.


मैंने प्रभु से मांगा प्यार
उन्होंने मुझे दिए दुःखी लोग, मदद करने के लिये.


मैंने प्रभु से मांगी हिम्मत
उन्होंने मुझे दी परेशानियां, उबर पाने के लिये.

मैंने प्रभु से मांगा वरदान
उन्होंने मुझे दिये अवसर उन्हें पाने के लिये.


वो मुझे नहीं मिला जो मैंने मांगा था. किन्तु
मुझे वो मिल गया जो मुझे चाहिये था.

Monday, June 10, 2013

शोषित कहाँ नहीं है स्त्री...?


          कुछ दिनो पूर्व एक घटना पढने में आई थी- किसी बस्ती में रात्रि 12-1 बजे के लगभग किसी लडकी की मर्मभेदी चीखें सुनकर एक उम्रदराज महिला ने अपने झोपडे से बाहर निकलकर देखा तो बेतहाशा भागकर उसके घर के सामने से गुजरती फटी कुर्ती और नीचे से लगभग निर्वस्त्र युवती के पीछे चार लडके उसे पकडने के लिये दौडते आते दिखे । महिला ने झपटकर लाठी उठाकर उन लडकों को ललकारते हुए गांव के लोगों को आवाज लगाई तो वे लडके तत्काल दिशा बदलकर भाग खडे हुए । घबराई कांपती उस युवती को महिला ने अपने घर के वस्त्र और सुरक्षा देकर उस समय उन बलात्कारियों से मुक्त कराया । यहाँ इस घटना का उल्लेख इस विषय की शुरुआत करने मात्र से जुडा होने के कारण चर्चा में आ गया है, बाकि तो किसी भी दिन का कहीं का भी समाचार-पत्र उठाकर देख लिया जावे कहीं बलात्कार, कहीं प्रेम में धोखा, तो कहीं पद या पैसे का लालच देकर किसी भी रुप में हर तरफ स्त्री के इसी शोषित स्वरुप की निरन्तर पुष्टि होते हुए कहीं भी देखा जा सकता है ।

          ताजा संदर्भों में समान अधिकार रखने वाले नक्सलवादी संगठनों में इसी अभियान से जुडी 25 वर्षीया शोभा मंडी की आज ही के समाचार पत्र में पढी यह स्वीकारोक्ति इस लेख का माध्यम बन रही है जिसने इस अभियान में भी पुरुषों की इसी मानसिकता को न सिर्फ विवशतापूर्वक 7 वर्षों तक संगठन के सीनियर कमांडरों द्वारा स्वयं झेला बल्कि अभियान से जुडी हर स्त्री को समूचे समूहों में हर समय पुरुष साथियों द्वारा अपनी हवस का शिकार बनते देखा है । उनका कहना है कि मेरे साथ यह सब तब हुआ जबकि मैं 25-30 सशस्त्र नक्सलियों की कमांडर थी । उनकी स्वीकारोक्ति के मुताबिक नक्सलियों के बीच पत्नियों का आदान-प्रदान, साथी महिला नक्सलियों को मारना-पीटना और उनसे नियमित बलात्कार करना इन समूहों में बेहद आम बात है । इस दरम्यान यदि कोई महिला गर्भवती हो जावे तो उसे अनिवार्य रुप से गर्भपात की पीडा से भी गुजरना ही पडता है क्योंकि बच्चे होने से उनके इस नक्सली अभियान में बाधा आती है । यह महिला इस आंदोलन से इस भ्रम के साथ जुडी थी कि यहाँ महिला और पुरुषों में कोई भेदभाव नहीं होता होगा और सभी महिला-पुरुष एक ही अभियान के अंतर्गत कार्यरत दिखते हैं । संगठन में स्त्रियों के प्रति इस भेदभाव से क्षुब्ध इस युवती ने 2010 में आत्म-समर्पण करके ही इस अनाचार से मुक्ति पाई थी ।

          डाकू साम्राज्ञी फूलन देवी के जीवन पर आधारित द बेंडिट क्वीन फिल्म में भी यही देखा कि अनेकों बार इन्सानी हवस का शिकार बनने पर बदला लेने के लिये डकैत बननी वाली इस ताकतवर महिला डकैत को इस रुप में भी जब-तब स्त्री होने के कारण अपने ही साथियों की हवस का शिकार भी होते रहना पडा था । जहाँ-जहाँ युद्धों में कोई भी सेना जीती है तो सबसे पहले वहाँ की स्त्रियां ही उनकी सामूहिक हवस का शिकार बनती दिखी हैं । जब-जब विस्थापितों की मदद के लिये केम्प लगते दिखे हैं तो वहाँ भी जिन्दा रहने की कीमत स्त्रियों को सबसे पहले अपना शरीर समर्पित करके ही चुकाते हुए हर बार पढा है । जेलों में वर्षों से बन्दी महिलाएं जेल में गर्भवती पाई जाती हैं तो अनाथ आश्रमों में छोटी बच्चीयों तक को रात के अन्धेरे में बडे-बडे नेताओं और रसूखपरस्त लोगों की इसी खिदमत के लिये निरन्तर उपयोग में लाया जाना नियमित रुप से दिखता रहता है । वे लडकियां-युवतियां जो रेल्वे स्टेशन जैसे क्षेत्रों में रात के समय किसी भी कारण से यदि अकेली मिल जाती हैं तो समाचार-पत्रों की सुर्खी बने बगैर वहीं घूमते रहने वाले नशेबाजों की आसान हवस का शिकार बने बगैर शायद ही कभी बाहर आ पाती होंगी । झुग्गी-झोपडी जैसे क्षेत्रों में पलने-बढने वाली लडकियां तो वेश्यावृत्ति जैसे व्यवसाय से कोसों दूर रहने के बावजूद भी आस-पास के युवकों व पुरुषों की इसी हवस का आसान शिकार होते रहने के कारण इसकी अभ्यस्त भी होती चली जाती हैं ।

          पौराणिक व ऐतिहासिक जानकारियों पर यदि नजर डाली जावे तो पुराने युगों में भी ऐसे ही किस्से पढने व चलचित्रों में देखने में आए हैं जहाँ इन्द्र जैसे देवगण भी किसी ऋषि-मुनि की पत्नी से उनके पति के रुप में अपना रुप बदलकर उनका शोषण करते दिखते रहे हैं और चित्रलेखा जैसी ऐतिहासिक नर्तकी जो किसी कर्मठ सन्यासी से प्रभावित हो अपना सब वैभव त्यागकर दीक्षा धारण करके उसके मठ में रहने आ जाती है तो वो भी अंततः उसी सन्यासी की अकस्मात् जागृत हवस की शिकार हो शोषित हुए बगैर नहीं रह पाती है । आधुनिक साधु-संतों के मठों में स्त्रियों के शोषण का यह सिलसिला जब-तब समाचार-पत्रों की सुर्खी बनते दिखता रहता है और गुपचुप चलने वाले कांडों में यहां तक कि तीर्थ क्षेत्रों में दर्शनों के लिये पहुँचने वाले श्रद्धालुओं के समूहों में सुबह शीघ्र दर्शनों के लिये रवाना होने हेतु वहाँ स्त्री-पुरुषों को भोजन प्रशादी के बाद स्नान करके स्त्रियों और पुरुषों को समूह में अलग-अलग कमरों में नियमानुसार वस्त्र बदलवाकर सुलाया जाता है जहाँ स्त्रियों के कमरे से लगे बन्द दरवाजे में उनकी तरफ से लगाई जा सके ऐसी कोई सांकल-चिटखनी नहीं होती । आस्था में लिप्त वे युवतियां प्रशाद में मौजूद नशीली मादकता के प्रभाव में जब सो जाती हैं तब आधी रात को उस बगैर कुंडी के दरवाजे से कमरे में घुसने वाले पंडों-पुजारियों का समूह उनमें से किसी भी स्त्री को भोगें बगैर सुरक्षित नहीं निकलने देता और संकोचग्रस्त वे महिलाएँ अपने पति तक से खुलकर इस अनाचार की शिकायत भी नहीं कर पातीं ।

          ले-देकर इनके जन्मदाताओं के लिये सामाजिक रुप से इनकी सुरक्षा का एक ही उपाय चलन में बचता है कि इनका विवाह कर मानसिक व सामाजिक रुप से इनके प्रति हो सकने वाली ऐसी किसी भी समस्या से इनको व स्वयं को सुरक्षित कर लें । निश्चय ही स्त्रियों की सुरक्षा का इससे अधिक सुरक्षित तरीका दूसरा शायद कोई होगा भी नहीं किन्तु यहाँ भी कई बार काम के प्रति पूर्णतः अनिच्छुक रहने के बावजूद पति की इस मांग के आगे मजबूरीवश ही सही स्त्री को अपने ही पति को भी उस वक्त तो किसी शोषित भोग्या के समान ही क्या बर्दाश्त नहीं करना पडता है ?
  

Thursday, May 30, 2013

कल्पना - स्त्री-विहीन गांव की.


          प्रसूता दर्द से कराह रही है और दाई सहित दो-चार बडी-बूढी औरतें जचगी करवाने में जुटी हैं, कमरे के बाहर स्त्री का पति अपने परिचितों के साथ परेशानहाल बैठा है और परिचित दिलासा दे रहे हैं कि सब ठीक होगा । नवजात शिशु के रोने की आवाज आती है और प्रसूता का पति प्रसन्नता में चम्मच से थाली बजाने लगता है तभी दाई आकर खबर देती है, लडकी...!  थाली बजना बंद, दूध का टब भरवाया जाता है और अगले साल लडके की आस में गांव के लोगों की मौजूदगी में उस नवजात लडकी को दूध के टब में डूबोकर मार दिया जाता है ।

प्रचलित प्रथा के चलते गांव में लडकियों का अकाल पड जाता है और तीस-चालीस वर्षीय कुंवारों की ऐसी फौज खडी हो जाती है जो आस-पास के गांवों में लाख-दो लाख रु. नगद देकर भी विवाह के लिये लडकियां लाने की कोशिश करते हैं पर वहाँ भी लडकियां नहीं मिलती । उन कुंवारे लडकों की मानसिक भूख का दोहन करने और उनके मनोरंजन के प्रयास में नाटक मंडली वाले भी चिकने-चुपडे लडके से ही मेकअप करवाकर धोखे से उनसे ही लडकियों के उत्तेजक नृत्य करवाकर अपना धंधा चलाते हैं और गांव में ही एक व्यापारी उनके मनोरंजन के लिये ब्ल्यू फिल्मों के सार्वजनिक शो अपने घर के टी.वी. पर दिखा-दिखाकर पैसे बनाता है । उत्तेजना की अधिकता में गांव के मुखिया का बडा लडका चलती ब्ल्यू फिल्म के दौरान ही सबकी नजर बचाकर गौशाला में बंधी गाय के पास ही अपनी भडास निकालने पहुँच जाता है और बेचारी अकेली गाय... रंभाती ही रह जाती है ।

          विधुर मुखिया के पांच में से बडे चार लडके हर समय अपने पिता से शिकायत करते दिखते हैं कि कभी हमारी शादी भी करवाओगे कि नहीं, परेशानहाल पिता 'पंडित लडकी ढूंढ तो रहा है' कहते हुए अपनी पीडा व्यक्त करते दिखता है और पंडित, वह खुद भी तो स्त्री शरीर का भूखा ही रहता है । तभी बडे लडके का दोस्त उसे यह बताते हुए खुशखबरी देता है कि परसों मेरी शादी हो रही है, गांव में पिछले 15 वर्षों में यह पहली शादी है, मेरे पिता ने मेरे लिये 14 वर्ष की अप्सरा तलाशी है और तुम्हें शादी में अवश्य आना है । शादी में जिस लडकी की उम्र उसका होने वाला पति 14 वर्ष बताता है वह 9-10 वर्ष की होती है जिसके पिता ने दो-लाख रुपये नगद लेकर अपनी मासूम लडकी अधेड युवक के हाथों सौंपी होती है और फेरों के दौरान पंडित स्वयं आपा खोकर स्त्री का नग्न शरीर देखने की लालसा में उसका लंहगा तक खींच देता है जिससे पल-दो पल के लिये शादी में शामिल सभी ग्रामीणों को आधा-अधूरा नयनसुख हासिल हो जाता है ।

          एक दिन अचानक उस पंडित को यौवनभार से लदी एक जवान और खूबसूरत लडकी जंगल के एकान्त में बैर खाते व गुनगुनाते दिख जाती है, लडकी पंडित को देखकर दौड लगाते हुए अपने घर की ओर भाग लेती है और पीछे-पीछे भागकर पंडित उस लडकी के ऐसे घर तक पहुँच जाता है जिसके मुख्य द्वार पर ताला और चहारदीवारी पर निसरनी (सीढी) लगी रहती है, लडकी सीढियां चढकर अपने घर में कूद जाती है और पंडित भी दरवाजा खटखटाने के बाद उसी सीढी पर चढकर लडकी के गरीब पिता से यह पूछते हुए कि ऐसे लडकी को छुपाकर क्यों रख रखा है, लडकी का पिता कहता है छुपाकर नहीं रखता तो गांव के लोग इसे भी कभी का मरवा देते । अब तो मैं इसके लिये किसी योग्य वर की तलाथ में हूँ । पंडित उस गरीब को एक लाख रु. नगद दिलवाने के वादे के साथ बहुत अच्छे खानदान के बहुत योग्य लडके से शादी करवाने का आश्वासन देते हुए उसका विश्वास जीतकर गांव के मुखिया के पास आता है और मुखिया अपने सबसे छोटे बेटे से गाडी चलवाते हुए पंडित के साथ उसी समय उस लडकी के पिता से मिलता है जहाँ मुखिया के बडे लडके का फोटो देखकर लडकी का पिता रुपये के आश्वासन के बावजूद यह कहते उसके प्रस्ताव में रुचि नहीं लेता कि यदि वो चाहे तो उसके छोटे बेटे के साथ वो यह शादी कर सकता है । 

          परेशान हाल वापसी में मुखिया के दिमाग में एक विचार कौंधता है और उस गरीब व्यक्ति के समक्ष नगद पांच लाख रुपये रखकर उसकी इकलौती लडकी का विवाह अपने पांचों बेटों के साथ एक ही बेदी और मुर्हत में करवा देता है । अब मुखिया के घर में बेटों के साथ पिता की मौजूदगी में बडा बेटा यह गणित बैठाता दिखता है कि बडा होने के नाते फीता तो मैं ही काटूंगा और बाकि के दिन बारी-बारी से चारों भाईयों का नम्बर लगने पर भी जो दो दिन बच रहे हैं उसका बंटवारा कैसे करें । तब औरत मिलने की खुशी में झूमता उसका छोटा भाई दरियादिली दिखाने की शैली में बडे से कहता है कि भैया ये दो दिन भी आप ही ले लो । यह सब सुनकर मुखिया पिता का दिमाग भन्नाने लगता है, वह अपने बेटों से कहता है - नालायकों कुछ मेरे बारे में भी तो सोचो । तुम्हारी माँ को मरें 20 साल हो गये तबसे मैं ही तुम्हें माँ और बाप दोनों के स्थान पर पाल रहा हूँ और आज भी नगद पांच लाख रुपये देकर मैं ही इस लडकी को तुम्हारे लिये घर में लाया हूँ । पिता की ईच्छा समझ बेटे स्वीकृति दे देते हैं और यौवनभार से लदी उस अनछुई बहू के साथ आधी-अधूरी शरीर क्षमता वाला बूढा मुखिया स्वयं फीता काटने का गौरव हासिल करने सुहागरात का श्रीगणेश  खुद ही कर डालता है । 

          असहाय लडकी आंसू बहाती रहती है और हर नये दिन नया पुरुष मुखिया के बेटे के रुप में उसे नोचने-खसोटने पहुँचते रहते हैं । दूध दुहने और पानी खिंचने जैसे काम जिसकी उस लडकी को कभी आदत ही नहीं होती वे भी उसके जिम्मे डाल दिये जाते हैं, जहाँ मानवीय संवेदनाओं के साथ मुखिया का छोटा बेटा उसकी मदद करता है । कुछ तो मुखिया के उस छोटे पुत्र का लडकी के दुःखों के प्रति करुणा का भाव और कुछ हमउम्र होने का मानवीय लगाव, जिसके चलते दिन में जब वे अक्सर साथ में दिखने लगते हैं तो मुखिया पिता सहित शेष चारों भाई षडयंत्रपूर्वक उस छोटे पुत्र की भी हत्या करवाकर उसे भी राह से हटा देते हैं । दुःखियारी लडकी अपने घर के दलित समाज के छोटी उम्र के नौकर के द्वारा इनके जुल्मों की दास्तान पत्र में लिखकर न्याय की आस में अपने पिता के पास पहुँचाती है तो लडकी का पिता जो अब गरीब नहीं रहा, कार में बैठकर मोबाईल हाथ में ले इन्हें धमकाने आता है और अपनी लडकी के शरीर में मुखिया की हिस्सेदारी के मुआवजे के रुप में और एक लाख रुपये नगद लेकर अपनी ही लडकी को दिलासा देते हुए वापस चला जाता है ।  
  
          अपने पिता से शिकायत के दंडस्वरुप मुखिया का परिवार जब उस लडकी पर और अधिक जुल्म करने लगता हैं तो बचाव में लडकी उसी छोटी उम्र के दलित समाज के नौकर के साथ मुखिया के घर से भाग जाती है । मुखिया के बेटे उन्हें ढूंढकर उस दलित नौकर की भी हत्या कर देते हैं और लडकी को दंडस्वरुप मुखिया के आदेश से गाय जैसा रस्सीयों से बांधकर बाडे में जानवरों के साथ पटक देते हैं जहाँ मुखिया के घर का नया नौकर उस लडकी को चोरी-छिपे दूध पिलाकर उसकी जान बचवाता है । इधर मुखिया तो लडकी को अपवित्र हुआ मानकर उसका पीछा छोड देता है किन्तु उसके बेटों के साथ ही गांव के दलित समाज का नेता भी अपने साथी को साथ ले मुखिया के प्रति अपने समाज के लोगों को भडकाने के साथ-साथ चोरी-छिपे इस लडकी का दैहिक शोषण करने लगातार आने लगता है । बाडे में जानवरों के साथ बंधी लडकी जब गर्भवती हो जाती है तो यह खबर जानकर उसकी होने वाली सन्तान (पुत्र) का गौरव हासिल करने का श्रेय बडे बेटे को यह कहते हुए झिडककर की पहली रात तो मैं ही उसके साथ था इसलिये होने वाले इस बच्चे का बाप भी मैं ही हूँ, उस लडकी को बाडे से निकालकर मुखिया फिर से घर में ले आता है जबकि दलित समाज का नेता होने वाले उस बच्चे पर अपना अधिकार मानते हुए दलित समाज की पूरी भीड को लेकर मुखिया के घर धावा बोल देता है । मुखिया क्रोध में उस लडकी पर घासलेट डालकर उसे जलाने लगता है तो उस लडकी के बचाव में मुखिया का घरेलू नौकर मुखिया की हत्या कर देता है ।

                मुखिया के बेटे अपने जुल्मों के कारण दलित समाज की आक्रोशित भीड के हाथों मारे जाते हैं और गर्भवती लडकी पुनः लडकी को ही जन्म देती है ।

          निःसंदेह यह एक काल्पनिक कहानी है जिसे बोनी कपूर व श्रीदेवी ने राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम के लिये टेलीफिल्म के रुप में "मातृभूमि" नाम से रोचक शैली में  फिल्मांकित किया है, किन्तु देश के अनेक राज्यों में जहाँ लडकों के समक्ष लडकियों के जन्म का अनुपात 1000 पर 800/850 के मध्य रह जाने मात्र से कुंआरे युवकों की भीड बढती चली जा रही है, वहीं यदि लडकियों को जन्म लेने से इसी प्रकार रोका जाता रहा तो स्थिति और कितनी विकट होगी ?