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Thursday, February 23, 2017

महिला सुरक्षा - विशेष.



          एक नारी को तब क्या करना चाहिये जब वह देर रात में किसी उँची इमारत की लिफ़्ट में किसी अजनबी के साथ स्वयं को अकेला पाये ?

          विशेषज्ञ का कहना है: जब आप लिफ़्ट में प्रवेश करें और आपको 13वीं मंज़िल पर जाना हो, तो अपनी मंज़िल तक के सभी बटनों को दबा दें ! कोई भी व्यक्ति उस परिस्थिति में हमला नहीं कर सकता जब लिफ़्ट प्रत्येक मंजिल पर रुकती हो ।

          2. जब आप घर में अकेली हों और कोई अजनबी आप पर हमला करे तो क्या करें ? तुरन्त रसोईघर की ओर दौड़ जाएँ...

          विशेषज्ञ का कहना है: आप स्वयं ही जानती हैं कि रसोई में पिसी मिर्च या हल्दी कहाँ पर उपलब्ध है और कहाँ पर चक्की व प्लेट रखे हैं ? यह सभी आपकी सुरक्षा के औज़ार का कार्य कर सकते हैं और भी नहीं तो प्लेट व बर्तनों को ज़ोर-जोर से फैंके भले ही टूटें और चिल्लाना शुरु कर दें । स्मरण रखें कि शोरगुल ऐसे व्यक्तियों का सबसे बड़ा दुश्मन होता है । वह अपने आप को पकड़ा जाना कभी भी पसंद नहीं करेगा ।

          3. रात में ऑटो या टैक्सी से सफ़र करते समय ?

          विशेषज्ञ का कहना है: ऑटो या टैक्सी में बैठते समय उसका नं. नोट करके अपने पारिवारिक सदस्यों या मित्र को मोबाईल पर उस भाषा में विवरण से तुरन्त सूचित करें जिसको कि ड्राइवर जानता हो । मोबाइल पर यदि कोई बात नहीं हो पा रही हो या उत्तर न भी मिल रहा हो तो भी ऐसा ही प्रदर्शित करें कि आपकी बात हो रही है व गाड़ी का विवरण आपके परिवार/ मित्र को मिल चुका है । इससे ड्राईवर को आभास होगा कि उसकी गाड़ी का विवरण कोई व्यक्ति जानता है और यदि कोई दुस्साहस किया गया तो वह अविलम्ब पकड़ में आ जायेगा । इस परिस्थिति में वह आपको सुरक्षित स्थिति में आपके घर पहुँचायेगा । जिस व्यक्ति से ख़तरा होने की आशंका थी अब वही आपकी सुरक्षा का ध्यान रखेगा ।

          4. यदि ड्राईवर गाड़ी को उस गली/रास्ते पर मोड़ दे जहाँ जाना न हो और आपको महसूस हो कि आगे ख़तरा हो सकता है - तो क्या करें ?

          विशेषज्ञ का कहना है कि आप अपने पर्स के हैंडल या अपने दुपट्टा/ चुनरी का प्रयोग उसकी गर्दन पर लपेट कर अपनी तरफ़ पीछे खींचती हैं तो चंद सेकंड में ही वह व्यक्ति असहाय व निर्बल हो जायेगा । यदि आपके पास पर्स या दुपट्टा न भी हो तो भी आप न घबराएं । आप उसकी क़मीज़ के काल़र को पीछे से पकड़ कर खींचेंगी तो शर्ट का जो बटन लगाया हुआ है वह भी वही काम करेगा और  आपको अपने बचाव का मौक़ा मिल जायेगा ।

          5. यदि रात में कोई आपका पीछा करता है ?

          विशेषज्ञ का कहना है : किसी भी नज़दीकी खुली दुकान या घर में घुस कर उन्हें अपनी परेशानी बतायें । यदि रात होने के कारण दरवाजे बन्द हों और नज़दीक में एटीएम हो तो एटीएम बाक्स में घुस जायें क्योंकि वहाँ पर सीसीटीवी कैमरा लगे होते हैं । पहचान उजागर होने के भय से किसी की भी आप पर वार करने की हिम्मत  नहीं होगी ।

           आख़िरकार मानसिक रुप से जागरुक होना ही आपका आपके पास रहने वाला सबसे बड़ा हथियार सिद्ध होगा । 

          कृपया समस्त नारी-शक्ति
अपनी माताश्री, बहन, पत्नी व महिला मित्रों, जिनका भी आपको ख़्याल है, उन्हें न केवल यह बतायें बल्कि उन्हें जागरुक भी कीजिए । समस्त नारी जाति की सुरक्षा के लिये ऐसा करना हम सभी को अपना नैतिक उत्तरदायित्व मानना चाहिये ।
           

Friday, February 10, 2017

अपने हाथ की उंगलियो से अपने बारे में जानिये !


          जैसा कि तस्वीर मे दिखाया गया है उस से आपको हाथ की उंगलियों के नाम पता चल गये होंगे ।

सबसे पहले तर्जनी की बात...

          अगर यह उंगली सीधी है, कहीं से भी टेडापन नहीं है और ना ही इस उंगली का झुकाव मध्यमा की तरफ या अंगूठे की तरफ हो रहा हो तो ऐसा व्यक्ति इरादे का पक्का, बुलंदी को छुने का इरादा रखने वाला और दूसरों पर राज़ करने वाला होना चाहिये ।

फिर मध्यमा की बात...

          अगर यह उंगली सीधी है, कहीं से भी टेडापन नहीं है और ना ही इस उंगली का झुकाव अनामिका की तरफ या तर्जनी की तरफ हो रहा हो तो ऐसा व्यक्ति सन्यास / उदासी को पसंद करने वाला - अलग थलग रहने का आदि और भीड़ में/घर परिवार मे घुलमिल कर न रहने वाला होना चाहिये ।

 अब अनामिका की बात...

          अगर यह उंगली सीधी है, कहीं से भी टेढापन नहीं है और ना ही इस उंगली का झुकाव मध्यमा या कनिष्का की तरफ हो रहा हो तो ऐसा व्यक्ति अपने हाथ की / से कमाई करने वाला, उसके पास कोई ना कोई हुनर होगा जिस से वो कमाई कर रहा होगा । खुद भी हाथ से काम करके खुश होगा / हाथ से काम करना पसंद करेगा ।

अब कनिष्का / कनिष्ठ की बात...

          अगर यह उंगली सीधी है, कहीं से भी
टेढापन नहीं है और ना ही इस उंगली का झुकाव अनामिका की तरफ हो रहा हो तो ऐसा व्यक्ति बोलने मे माहिर ( तर्क शक्ति का होना ) और दिमागी तौर पर बलवान होना चाहिये ।

          सीधी उंगलियों के बारे जानने के बाद अब झुकाव किस तरफ है उंगली का और उसका क्या असर होगा यह समझते हैं ।

          अगर सभी उंगलियों का झुकाव तर्जनी की तरफ हो रहा है तो ऐसा व्यक्ति पक्के इरादे वाला, आज़ाद तबियत का मालिक और कभी भी हौसला ना हारने वाला होगा ।
  
          अगर तर्जनी का झुकाव मध्यमा की तरफ हो जाये तो जो उपर लिखा है उसके उल्ट प्रभाव वाला होना चाहिये ।

          अगर सभी उंगलियों का झुकाव मध्यमा कि तरफ हो जाये तो उदासी और अकेलेपन का आदि होगा ।

          अगर मध्यमा का झुकाव तर्जनी की तरफ हो तो दुनिया को छोड़ देने का ख्याल और बेकार के ख्यालों में खोये रहने वाली उदासी का मालिक होगा ।

          अगर मध्यमा का झुकाव अनामिका की तरफ हो तो एक क्षण में खुश और दूसरे ही क्षण उदास टाईप की अजीबो गरीब तबियत का मालिक होगा ।

          अगर अनामिका का झुकाव मध्यमा की तरफ हो जाये तो शोहरत चाहने वाला होगा जो कि थोड़ी बहुत मिल भी सकती है ।

          अगर अनामिका का झुकाव कनिष्का / कनिष्ठ की तरफ हो तो हाथ से काम करने वाला, व्यापारी और पैसे का पीर होगा, हो सकता है कि ऐसे व्यक्ति को पैसे से ज़्यादा किसी से प्यार न हो ।

          अगर कनिष्का/कनिष्ठ उंगली का झुकाव अनामिका की तरफ हो तो दिमागी ताकत का मालिक और हाथ के काम से लाभ उठाना जानता होगा ।

 

सोर्स : फेसबुक.


Tuesday, February 7, 2017

आने वाला कल...


           सन् 2095 यानि आज से लगभग 79 साल बाद...

          रितेश अपने कमरे में चुपचाप गुमसुम सा बैठा है, तभी मम्मी की तरंगे कैच होने लगती है (उस समय तक शायद मोबाईल म्यूज़ियम में पहुंच जावेंगे और ऐसे छोटे-छोटे ऊँगलियों में फिट होने वाले गेजेट्स आ जायेंगे जिनका बटन ऑन करने के बाद जिस व्यक्ति के बारे में सोचेंगे उस से मानसिक तरंगो से बात होना शुरू हो जाएगी जैसे अभी मोबाईल से होती है ।

 
           रितेश हलो मम्मी ...कैसी है आप ?


          मम्मी--ठीक हूँ बेटा... तू बता अभी अमेरिका में धूप निकली की नही  ?


          रितेश--नही मम्मी अभी कहाँ... करीब दो महीने तो हो गए... अभी तो अन्धेरा ही है और मौसम विभाग की भविष्यवाणी हुई है की अभी एक महीने और सूरज निकलने के आसार नही है ।


          मम्मी--हूँsss यहाँ भी स्थिति ठीक नही है...  पिछले एक महीने से सूरज ढल ही नही रहा...  85 डिग्री सेल्सियस तापमान बना हुआ है... भयंकर पराबैंगनी किरणे फैली हुई है... कल ही पडौस वाले जोशीजी का मांस पिघल कर गिरने लगा था... वो अभी भी I.C.U  में भर्ती है ।


          रितेश--ओह्ह...  तो क्या उन्होंने घर पे ओजोन कवर नही लगा रखा है ?


          मम्मी--घर पर
तो लगवा रखा है पर उनकी कार का ओजोन कवर थोडा पुराना हो गया था इसलिए... उसमें छेद हो गया और पराबैंगनी किरणें उनकी बॉडी से टच हो गई थी ।

        रितेश--अच्छा मम्मी आपने सुना इधर एक बड़ी घटना हो गई... परसों अमेरिका के किसी कस्बे में एक पौधा पाया गया... पूरी दुनिया में अफरातफरी मच गई । दुनिया भर के वैज्ञानिक वहाँ इकठ्ठा हो गए, काफी रिसर्च चल रही है, आखिर दुनिया में एक वनस्पति दिखाई देना बहुत बड़ी बात है ।


          मम्मी--अच्छा बेटा तू टाईम से अपने भोजन के केप्सूल तो लेता है ना ? और हाँ- वो पानी वाले केप्सूल लेना मत भूलना, वरना तेरी तबियत खराब हो जाएगी और टाईम से ऑक्सीजन लेते रहना बेटा, तेरे पापा ने एक बार ऑक्सीजन लेने में लापरवाही कर दी थी तो पूरे फेफड़े ही बदलवाने पड़ गए... तू तो जानता ही है की अच्छे वाले फेफड़े कितने महंगे हो गए है...।


          रितेश:---मम्मी अभी  बजाज के फेफड़े लांच होने वाले हैं जो किमत में काफी कम है और सर्विस होंडा के फेफड़ो जैसी ही रहेगी । और हां मम्मी आप भी याद रखना घर में तीन चार लिवर एक्स्ट्रा रखा करो..... यूं भी दादाजी को हर तीन महीने में नया लिवर लगता ही है, एकाध एक्स्ट्रा भी रहना चाहिए कब रात-बिरात जरूरत पड़ जाए ।


          अभी हमें यह मजाक लग सकता है, पर अपनी आने वाली पीढ़ी को यदि इन परिस्थितियों से बचाना है तो हमें  इसके लिये ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने ही होंगे और अपने दोस्तों/रिश्तेदारों/कलिग्स को भी इसके लिए प्रेरित करना होगा ।



Saturday, February 4, 2017

जाना-पहचाना सच...!



            एक राजा को मलाई रबड़ी खाने का शौक था । उसे रात में सोने से पहले मलाई रबड़ी खाए बिना नींद नहीं आती थी ।  इसके लिए राजा ने एक नौकर को रोजाना चार आने की मलाई लाने की ड्यूटी दे दी । यह क्रम कई दिनों तक चलता रहा ।

            कुछ समय बाद खजांची को शक हुआ कि कहीं  नौकर चार आने की मलाई में गड़बड़ तो नहीं कर रहा । उसने चुपचाप नौकर पर नजर रखनी शुरू की तो देखा कि नौकर केवल तीन आने की मलाई लाता है और एक आना बचा लेता है । अपनी चोरी पकड़ी जाने पर नौकर ने खजांची को एक आने की रिश्वत देना शुरू कर दिया अब राजा को दो आने की मलाई रबड़ी मिलती जिसे वह चार आने की समझ कर खाता ।

            कुछ दिन बाद राजा को शक हुआ कि मलाई की मात्रा में कमी हो रही है । राजा ने अपने खास मंत्री को अपनी शंका बतलाई और असलियत पता करने को कहा- मंत्री ने पूछताछ शुरू की तो खजांची ने एक आने का प्रस्ताव मंत्री को भी दे दिया ।

            अब हालात ये हुए कि नौकर को केवल दो आने मिलते जिसमें से एक आना नौकर रख लेता और एक आने की मलाई रबड़ी राजा के लिए ले जाता । कुछ दिन गुजरने पर हलवाई जिसकी दुकान से रोजाना मलाई रबड़ी जाती थी उसे संदेह हुआ कि पहले तीन आने की मलाई जाती थी अब घटते घटते एक आने की रह गई ।

            हलवाई ने नौकर को पूछना शुरू किया और राजा को बतलाने की धमकी दी । नौकर ने पूरी बात खजांची को बतलाई और खजांची ने मंत्री को । अंत में यह तय हुआ कि एक आना हलवाई को भी दे दिया जाये । अब समस्या यह हुई कि मलाई कहां से आएगी और राजा को क्या बताया जाएगा, इसकी जिम्मेदारी मंत्री ने ले ली ।

            इस घटना के बाद पहली बार ऐसा हुआ कि राजा को मलाई की प्रतीक्षा करते-करते नींद आ गयी । उसी समय मंत्री ने राजा की मूछों पर सफेद चाक (खड़िया) का घोल लगा दिया । अगले दिन राजा ने उठते ही नौकर को बुलाया तो मंत्री और खजांची भी दौड़े आए । राजा ने पूछा -कल मलाई क्यों नही लाये ?

             नौकर ने खजांची और मंत्री की ओर देखा.... तभी मंत्री बोला - हुजर यह लाया था,  आप सो गए थे  इसलिए मैने आपको सोते में ही खिला दी थी ।  देखिए अभी तक भी आपकी मूछों में लगी है । यह कहकर उसने राजा को आईना दिखाया । मूछों पर लगी सफेदी को देखकर राजा को विश्वास हो गया कि उसने मलाई खाई थी । 

            अब यह रोज का क्रम हो गया, खजाने से पैसे निकलते और बंट जाते, राजा के मुंह पर सफेदी लग जाती ।

            यह कहानी आज के समय में  भी एक दम फिट है । आप कल्पना करें कि- आम जनता राजा है, मंत्री हमारे नेता हैं और अधिकारी व ठेकेदार, खजांची और हलवाई हैं । पैसा भले कामों के लिए निकल रहा है और आम आदमी को चूना दिखाकर बहलाया जा रहा है ।


Friday, February 3, 2017

आधुनिकता और स्नेह


          चश्मा साफ़ करते हुए उस बुज़ुर्ग ने अपनी पत्नी से कहा - हमारे ज़माने में मोबाइल नही थे…!

           पत्नी : पर ठीक पाँच बजकर पचपन मिनीट पर में पानी का ग्लास लेकर दरवाज़े पे आती और आप आ पहुँचते ।

           पति : हाँ मैंने तीस साल नौकरी की पर आज तक में समझ नहीं पाया की मैं आता इसलिए तुम पानी लाती थी या तुम पानी लेकर आती इसलिये में आता था ।

            हाँ…और याद है तुम्हारे रिटायर होने से पहले जब तुम्हें डायबिटीज़ नहीं थी और मैं तुम्हारी मनपसंद खीर बनाती तब तुम कहते थे कि आज दोपहर में ही ख़याल आया था की आज तो खीर खाने को मिल जाए तो मज़ा आ जाए । 

            हाँ .…सच में…ऑफीस से निकलते वक़्त जो सोचता, घर आकर देखता था की वही तुमने बनाया है ।

            और तुम्हें याद है जब पहली डिलीवरी के वक़्त मैं मायके गई थी, और जब दर्द शुरु हुआ मुझे लगा काश तुम मेरे पास होते ! और घंटे भर में ही जैसे कि कोई ख़्वाब हो- तुम मेरे पास थे ।

           पति : हाँ …उस दिन यूं ही ख़याल आया की जरा देखलूं तुम्हें. 
         
           पत्नी : और जब तुम मेरी आँखों मे आँखें डाल कर कविता की दो लाइनें बोलते……

            पति : हाँ और तुम शर्मा के पलके झुका देती और मैं उसे अपनी कविता की 'लाइक' समझता ।


          पत्नी : और हाँ जब दोपहर को चाय बनाते वक़्त मे थोड़ा जल गई थी और उसी शाम तुम बर्नोल की ट्यूब अपनी जेब से निकालकर बोले इसे अलमारी मे रख दो । 

            पति : हाँ पिछले दिन ही मैंने देखा था कि ट्यूब ख़त्म हो गई है, पता नहीं कब जरुरत पड़ जाए ये सोचकर मैं ले आया था ।

            पत्नी : तुम कहते आज ऑफिस के बाद तुम वहीं आ जाना सिनेमा देखेंगे और खाना भी बाहर खा लेंगे ।

            पति : और जब तुम आती तो जो मैंने सोच रखा हो तुम वही साड़ी पहन कर आती थी ।

            फिर नज़दीक जा कर उसका हाथ थाम कर कहा- हाँ हमारे समय मे मोबाइल नही था पर… "हम दोनों थे ।"

            आज बेटा और बहू  साथ तो होते है पर, बातें नही व्हाट्स एप होता है, लगाव नही टेग होता है, केमिस्ट्री नही कमेन्ट होता है, लव नही लाइक होता है, मिठी नोकझोक नही अनफ्रेन्ड होता है । उन्हें बच्चे नहीं केन्डीक्रश, सागा, टेम्पल रन और सबवे होता है ।

            छोड़ो ये सब बातें हम अब वायब्रंट मोड़ पर हैं और हमारी बेटरी भी १ लाईन पर है...

            अरे..!  कहाँ चल दी  ? 

            चाय बनाने …

            भई वाह- मैं कहने ही वाला था कि चाय बना दो ना, पता है मैं अभी भी कवरेज में हूँ और मैसेज भी आते हैं । 

            दोनों हँस पड़े - हाँ हमारे ज़माने मे मोबाइल नही थे...
  
Source : What'sApp.

Saturday, January 28, 2017

वैवाहिक जीवन में साथी का महत्व...


           कॉलेज में पूर्व छात्रों का Happy married life पर एक कार्यक्रम हो रहा था,  जिसमे लगभग सभी विवाहित छात्र हिस्सा ले रहे थे । जिस समय प्रोफेसर मंच पर आए तब उन्होने देखा कि सभी छात्र पति-पत्नी व शादी सम्बंधों पर जोक कर हँस रहे थे । यह देखकर प्रोफेसर बोले कि चलो पहले  एक Game खेलते हैं,  उसके बाद  अपने विषय पर बातें करेंगे । 
 
            सभी  खुश हो गए और कहा कोनसा Game ?
 
            प्रोफ़ेसर ने एक विवाहित लड़की को खड़ा किया और कहा कि तुम ब्लेकबोर्ड पर ऐसे 25-30 लोगों के  नाम लिखो जो तुम्हें अच्छे लगते हैं...
 
            लड़की ने पहले अपने परिवार के लोगों के नाम लिखे फिर अपने सगे-सम्बन्धी,  दोस्तों, पडोसियों और सहकर्मियों के नाम लिख दिए ।
 
            तब प्रोफ़ेसर ने उनमें से कोई भी कम पसंद वाले 5 नाम मिटाने को कहा-
 
           लड़की ने अपने सहकर्मियों के नाम मिटा दिए ।
 
            प्रोफ़ेसर ने और 5 नाम मिटाने को कहा-
 
            लड़की ने थोडा सोच कर अपने पड़ोसियो के नाम मिटा दिए ।
 
            अब प्रोफ़ेसर ने उनमें से कोई भी चार को छोडकर बाकि नाम मिटाने को कहा-
 
            लड़की ने अपने सगे-सम्बन्धी और दोस्तों के नाम मिटा दिए । अब बोर्ड पर सिर्फ 4 नाम बचे थे जो उसके मम्मी-पापा, पति और बच्चे के नाम थे ।
 
            अब प्रोफ़ेसर ने कहा इसमें से और 2 नाम मिटा दो-
 
            लड़की असमंजस में पड गयी बहुत सोचने के बाद कुछ दुखी होते हुए उसने अपने मम्मी-पापा के नाम मिटा दिए ।
 
            सभी लोग स्तब्ध और शांत थे क्योंकि वे जानते थे कि यह गेम सिर्फ वो लड़की ही नहीं खेल रही थी बल्कि उनके अपने दिमाग में भी यही सब चल रहा था ।
 
            अब सिर्फ दो ही नाम बचे थे । एक उसके पति का और दूसरा उसके बेटे का...
 
            प्रोफ़ेसर ने कहा - अब और एक नाम इसमें से भी मिटा दो-
 
            अब तो वह लडकी सहमी सी रह गयी... बहुत सोचने के बाद लगभग रोती सी मनोदशा के साथ उसने अपने बेटे का नाम काट दिया । प्रोफ़ेसर ने  उस लड़की से कहा अब तुम अपनी जगह पर जाकर बैठ जाओ ।
 
            फिर सभी की तरफ गौर से देखते हुए पूछा- क्या आपमें से कोई बता सकता है कि ऐसा क्यों हुआ कि आखिर में सिर्फ पति का ही नाम बोर्ड पर रह गया।
 
            कोई जवाब नहीं दे पाया ।  सभी मुँह लटकाए बैठे थे...!  प्रोफ़ेसर ने फिर उस लड़की को खड़ा किया और पूछा -  ऐसा क्यों ? जिसने तुम्हे जन्म दिया और पाल पोस कर इतना बड़ा किया उनका नाम तुमने मिटा दिया,  और तो और अपनी कोख से जिस बच्चे को तुमने जन्म दिया उसका भी नाम मिटा दिया  ?
 
            लड़की ने जवाब दिया - मम्मी-पापा तो अब बूढ़े हो चले हैं,  कुछ साल के बाद वो मुझे और इस दुनिया को छोड़ के चले ही जायेंगे । मेरा बेटा जब बड़ा हो जायेगा तो जरूरी नहीं कि वो शादी के बाद मेरे साथ ही रहे ।
 
            लेकिन मेरे पति जब तक मेरी जान में जान है तब तक मेरा आधा शरीर बनके मेरा साथ निभायेंगे इसलिए मेरे पति ही मेरे लिये सबसे अजीज हैं ।
 
           प्रोफ़ेसर और बाकी स्टूडेंट ने तालियों की गूंज से लड़की की बात का समर्थन किया ।
 
          प्रोफ़ेसर ने कहा तुमने बिलकुल सही कहा कि तुम और सभी के बिना रह सकती हो पर अपने आधे अंग अर्थात अपने पति के बिना नहीं रह सकती ।
 
            मजाक मस्ती तक तो ठीक है पर हर इंसान का अपना जीवन साथी ही उसको सब  से ज्यादा अजीज होता है, यही सच है सभी पतियों और पत्नियों के लिये । यह कभी मत भूलना कि जिंदगी के साथ भी और  जिन्दगी के बाद भी, अंत में तो दोनों ही होंगे ।
 
            भले ही झगड़ें, गुस्सा करें, एक दूसरे पर टूट पड़ें, एक दूसरे पर दादागीरी करलें किंतु अंत में ये दोनों ही होंगे ।

            जो कहना है  वह कह लें, जो करना है वह कर लें, किंतु एक दूसरे के चश्मे और लकड़ी ढूंढने के लिये अंत में ये दोनों ही होंगे ।

            मैं रूठूँ तो तुम मना लेना, तुम रूठो तो मैं मना लूंगा, एक दूसरे को लाड़ लड़ाने के लिए अंत में दोनों ही होंगे ।

            आंखें जब धुंधली होंगी, याददाश्त जब कमजोर होगी, तब एक दूसरे को, एक दूसरे में ढूंढने के लिए अंत में ये दोनों ही होंगे ।

            घुटने जब दुखने लगेंगे,  कमर भी झुकना बंद कर देगी,  तब एक दूसरे के पांव के नाखून काटने के लिए भी अन्त में ये दोनों ही होंगे ।

            "अरे मुुझे कुछ नहीं हुआ बिल्कुल ठीक तो हूँ" ऐसा कह कर एक दूसरे को बहलाने के लिए भी अंत में ये दोनों ही होंगे ।

            साथ जब छूट जाएगा, विदाई की घड़ी जब आ जाएगी, तब एक दूसरे को माफ करने के लिए भी अंत में यह दोनों ही होंगे ।
 
           टिप्पणी : पति-पत्नी पर व्यंग्य कितने भी हों पर अकाट्य सत्य यही है और यही रहेगा ।    
 

Thursday, January 26, 2017

सबक और आशा


            एक बेटा अपने वृद्ध पिता को रात्रि भोज के लिए एक अच्छे रेस्टॉरेंट में लेकर गया । खाने के दौरान वृद्ध पिता ने कई बार भोजन अपने कपड़ों पर गिराया ।  रेस्टॉरेंट में बैठे दुसरे खाना खा रहे लोग वृद्ध को तिरस्कारपूर्ण नजरों से देख रहे थे, लेकिन वृद्ध का बेटा शांत था ।
 
             खाने के बाद बिना किसी शर्म के बेटा, वृद्ध को वॉश रूम ले गया,  उसके कपड़े साफ़ किये, चेहरा साफ़ किया, बालों में कंघी की, और चश्मा पहनाकर बाहर लाया । सभी लोग खामोशी से उन्हें ही देख रहे थे । बेटे ने बिल का पेमेन्ट किया और अपने परिवार सहित बाहर जाने लगा । तभी डिनर कर रहे एक अन्य वृद्ध ने बेटे को आवाज दी और उससे पूछा- "क्या तुम्हे नहीं लगता कि यहाँ अपने पीछे तुम कुछ छोड़ कर जा रहे हो ?"

            बेटे ने जवाब दिया- "नहीं सर, मैं कुछ भी छोड़ कर नहीं जा रहा ।"

            वृद्ध ने कहा "बेटे, तुम यहाँ छोड़ कर जा रहे हो, प्रत्येक पुत्र के लिए एक शिक्षा (सबक) और प्रत्येक पिता के लिए उम्मीद (आशा)...

            दोस्तों आमतौर पर हम लोग अपने बुजुर्ग माता पिता को अपने साथ बाहर ले जाना पसंद नही करते और कहते हैं क्या करोगे आप से चला तो जाता नही, ठीक से खाया भी नही जाता । आप घर पर ही रहो वही अच्छा होगा ।

            किंतु आप यह क्यों भूल जाते हैं कि जब आप छोटे थे और आप के माता पिता आप को अपनी गोद मे उठा कर ले जाया करते थे । आप जब ठीक से खा नही पाते थे तो माँ आपको अपने हाथ से खाना खिलाती थी और खाना गिर जाने पर डाँट नही प्यार जताती थी । फिर वही माँ बाप उनके बुढापे मे भार स्वरुप क्यो लगने लगते है ?

            इस पृथ्वी पर तो माँ-बाप की तुलना भगवान से ही की गई है इसलिये उनकी सेवा कीजिये और उन्हे प्यार दीजिये, क्योकि एक दिन आप भी बूढे होंगे फिर अपने बच्चो से सेवा की उम्मीद कैसे करेंगे ? किंतु यदि इसे पढने के बाद अगर 10% लोगों में भी बदलाव आ गया तब तो यह पोस्ट अपने उद्देश्य में सार्थक है ही ।


Tuesday, January 24, 2017

शक्तिशाली कौन ?

            
            एक पिता ने अपने पुत्र की बहुत अच्छी परवरिश की । उसे अच्छी तरह से पढ़ाया, लिखाया, तथा उसकी सभी सुकामनाओ की पूर्ति की ।

            कालान्तर में वह पुत्र एक सफल इंसान बना और एक मल्टीनेशनल कंपनी में सी.ई.ओ. बन गया ।
  
            उच्च पद, अच्छा वेतन, सभी सुख सुविधांए उसे कंपनी की और से प्रदान की गई । समय गुजरता गया उसका विवाह एक सुलक्षणा कन्या से हो गया,  और उसके परिवार में एक सुन्दर कन्या भी पुत्री स्वरुप आ गई । पिता अब बूढा हो चला था । एक दिन पिता को पुत्र से मिलने की इच्छा हुई और वो पुत्र से मिलने उसके ऑफिस में गया ।


            वहां उसने देखा कि उसका पुत्र एक शानदार ऑफिस का अधिकारी बना हुआ है, उसके ऑफिस में सैंकड़ो कर्मचारी उसके अधीन कार्य कर रहे है ! ये सब देख कर पिता का सीना गर्व से फूल गया ।
    
              वो चुपके से उसके चेंबर में पीछे से जाकर उसके कंधे पर हाथ रख कर खड़ा हो गया  और उसने प्यार से अपने पुत्र से पूछा - "यहाँ सबसे शक्तिशाली इंसान कौन है" ?  पुत्र ने पिता को बड़े प्यार से हंसते हुए कहा "मेरे अलावा कौन हो सकता है पिताजी " ।
 
            पिता को इस जवाब की  आशा नहीं थी, उसे विश्वास था कि उसका बेटा गर्व से कहेगा - पिताजी यहाँ सब से शक्तिशाली इंसान आप हैं, जिन्होंने मुझे इस योग्य बनाया ।

            उनकी आँखे छलछला आई ! वो चेंबर के गेट को खोल कर बाहर निकलने लगे । न जाने क्या सोचकर उन्होंने एक बार पीछे मुड़ कर पुनः बेटे से पूछा- एक बार फिर बताओ यहाँ सब से शक्तिशाली इंसान कौन है ?
   
             पुत्र ने  इस बार कहा- "पिताजी आप हैं, यहाँ सब से शक्तिशाली इंसान" । पिता सुनकर आश्चर्यचकित हो गए उन्होंने कहा "अभी तो तुम अपने आप को यहाँ सब से शक्तिशाली इंसान बता रहे थे अब तुम मुझे बता रहे हो" ?
   
              पुत्र ने हंसते हुए ससम्मान उन्हें अपने सामने बिठाते हुए कहा - "पिताजी उस समय आप का हाथ मेरे कंधे पर था, जिस पुत्र के कंधे पर या सिर पर पिता का हाथ हो वो पुत्र तो सबसे शक्तिशाली इंसान ही होगा ना, बोलिए पिताजी"  ।
 
            पिता की आँखे भर आई उन्होंने अपने पुत्र को कस कर के अपने गले लग लिया । सच ही है जिस के कंधे पर या सिर पर पिता का हाथ होता है, वो ही इस दुनिया में सब से शक्तिशाली इंसान होता है ।

 
            सदैव अपने बुजुर्गों का सम्मान करें । क्योंकि न सिर्फ हमारी सफलता के पीछे वे ही होते हैं बल्कि वे होते हैं तो हम होते हैं ।
 

Sunday, January 22, 2017

आधुनिक तिमारदारी

            
         पिताजी बीमार पड़ गये, उन्हें आनन-फानन में नज़दीक के अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा । अस्पताल पहुँचते ही बेटे ने अस्पताल के बेड पर उनकी फोटो खींची और फेसबुक-वॉट्सएप पर Father ill admitted to hospital स्टेटस के साथ अपलोड कर दी ।

            फेसबुकिया यारों ने भी 'Like' मार-मार कर अपनी 'ड्यूटी' पूरी कर दी । बेटा भी अपने मोबाइल पर पिताजी की हालत 'Update' करता रहा । पिताजी व्याकुल आँखों से अपने 'व्यस्त' बेटे से बात करने को तरसते रहे...! 


            आज बेटे ने देखा कि पिताजी की हालत कुछ ज्यादा ख़राब है ! पुराना वक्त होता तो बेटा भागता हुआ डाक्टर को गुहार लगाता, पर उसने झट से 'बदहवास' पिता की एक-दो फोटो और खींच कर 'Condition critical'  के स्टेटस के साथ अपलोड कर दी,  फेसबुकिया यारों ने हर बार की तरह इस बार भी अपनी ज़िम्मेदारी पूरी ईमानदारी से निभा दी ।


            दो-चार घनिष्ठ मित्रों ने बेहद मार्मिक कमेंट कर अपने संवेदनशील होने का प्रमाण दिया । 'वाह ! इनकी आँख के आँसू भी साफ दिख रहे हैं । 'फोटो  कैमरे से लिया है या
मोबाइल से ?'

            तभी नर्स आई - 'आप ने पेशेंट को दवाई दी ? 

 
            दवाई ? 
 
           बिगड़ी हालत देख, नर्स ने घंटी बजाई 'इन्हें एमरजेंसी में ले जा रहे हैं !' 

            थोड़ी देर में 'बेटा' लिखता है- 'पिताजी चल बसे ! सॉरी..नो फोटो..मेरे पिताजी का अभी-अभी देहांत हो गया !  ICU में फोटो खींचनी अलाउड नहीं थी....'


            कुछ कमेंट्स आए - 'ओह, आखरी वक्त में आप फोटो भी नहीं खींच पाए !'


           'अस्पताल को अंतिम समय पर यादगार के लिए फोटो खींचने देना चाहिए थी !'


            'RIP'       'RIP'


            'अंतिम विदाई की फोटो जरूर अपलोड करना'


            पिताजी चले गए थे... पर बेटा संतुष्ट था.... इतने 'लाइक' और 'कमेंट्स' उसे पहले कभी नहीं आए थे....

 
            कुछ खास रिश्तेदार अस्पताल आ गए थे...      कुछ एक ने उसे गले लगाया...     गले लगते हुए भी बेटा मोबाइल पर कुछ लिख रहा था ।


            बेटा कितना कर्त्तव्यनिष्ठ था !  बाप के जाने के समय भी.... सबको 'थैंक्स टू ऑल' लिख रहा था...!


            रिश्ते अपना नया अर्थ खोज रहे थे !


Saturday, January 21, 2017

विकास व मुस्कान में साथी की अहमियत...

              
            मेरी पत्नी ने कुछ दिनों पहले घर की छत पर कुछ गमले रखवा दिए और एक छोटा सा गार्डन बना लिया । पिछले दिनों मैं छत पर गया तो यह देख कर हैरान रह गया कि कई गमलों में फूल खिल गए हैं, नींबू के पौधे में दो नींबू भी लटके हुए हैं और दो चार हरी मिर्च भी लटकी हुई नज़र आई ।

            मैंने देखा कि पिछले हफ्ते उसने बांस का जो पौधा गमले में लगाया था, उस गमले को घसीट कर दूसरे गमले के पास कर रही थी । मैंने कहा तुम इस भारी गमले को क्यों घसीट रही हो ? पत्नी ने मुझसे कहा कि यहां ये बांस का पौधा सूख रहा है, इसे खिसका कर इस पौधे के पास कर देते हैं । मैं हँस पड़ा और कहा - अरे पौधा सूख रहा है तो खाद डालो, पानी डालो । इसे खिसका कर किसी और पौधे के पास कर देने से क्या होगा ? पत्नी ने तब मुस्कुराते हुए कहा ये पौधा यहां अकेला है इसलिए मुर्झा रहा है । इसे इस पौधे के पास कर देंगे तो ये फिर लहलहा उठेगा । 


            पौधे भी अकेले में सूख जाते हैं, और उन्हें अगर किसी और पौधे का साथ मिल जाए तो जी उठते हैं । यह बहुत अजीब सी बात थी। एक-एक कर कई तस्वीरें आखों के आगे बनती चली गई...


            मां की मौत के बाद पिताजी कैसे एक ही रात में बूढ़े, बहुत बूढ़े हो गए थे । हालांकि मां के जाने के बाद सोलह साल तक वो रहे, लेकिन सूखते हुए पौधे की तरह । मां के रहते हुए जिस पिताजी को मैंने कभी उदास नहीं देखा था, वो मां के जाने के बाद खामोश से हो गए थे । मुझे पत्नी के विश्वास पर पूरा विश्वास हो रहा था...  लग रहा था कि सचमुच पौधे भी अकेले में सूख जाते होंगे । 


            बचपन में एक बार
मैं बाज़ार से एक छोटी सी रंगीन मछली खरीद कर लाया था और उसे शीशे के जार में पानी भर कर रख दिया था । मछली सारा दिन गुमसुम रही । मैंने उसके लिए खाना भी डाला, लेकिन वो चुपचाप इधर-उधर पानी में अनमनी सा घूमती रही । सारा खाना जार की तलहटी में जाकर बैठ गया, मछली ने कुछ नहीं खाया । दो दिनों तक वो ऐसे ही रही, और एक सुबह मैंने देखा कि वो पानी की सतह पर उल्टी पड़ी थी । आज मुझे घर में पाली वो छोटी सी मछली याद आ रही थी । बचपन में किसी ने मुझे ये नहीं बताया था, अगर मालूम होता तो कम से कम दो- तीन या ढ़ेर सारी मछलियां खरीद लाता और मेरी वो प्यारी मछली यूं तन्हा न मर जाती । 

            बचपन में माँ से सुना था कि लोग मकान बनवाते थे तो रोशनी के लिए कमरे में दीपक रखने के दीवार में दो मोखे
इसलिए बनवाते थे क्योंकि माँ का कहना था कि बेचारा अकेला मोखा गुमसुम और उदास हो जाता है ।

            मुझे लगता है कि संसार में किसी को भी अकेलापन पसंद नहीं । आदमी हो या पौधा, हर किसी को किसी न किसी के साथ की ज़रुरत होती है ।


            आप अपने आसपास झांकिए, अगर कहीं कोई अकेला दिखे तो उसे अपना साथ दीजिए उसे मुरझाने से बचाइए और अगर आप अकेले हों, तो आप भी किसी का साथ लीजिए,  खुद को भी मुरझाने से रोकिए ।


            अकेलापन संसार में सबसे बड़ी सजा है । गमले के पौधे को तो हाथ से खींच कर दूसरे पौधे के पास किया जा सकता है, लेकिन आदमी को करीब लाने के लिए जरुरत होती है रिश्तों को समझने की, सहेजने की और समेटने की ।

 
            अगर मन के किसी कोने में आपको लगे कि ज़िंदगी का रस सूख रहा है,  जीवन मुरझा रहा है तो उस पर रिश्तों के प्यार का रस डालिए । खुश रहिए और मुस्कुराइए ।  कोई यूं ही किसी की भी गलती से आपसे दूर हो गया हो तो उसे अपने करीब लाने की कोशिश कीजिए और हो जाइए हरे-भरे ।



Thursday, January 19, 2017

फूटा घडा

            
            एक किसान के पास दो घडे थे जिसमें पानी की समस्या के कारण उसे दूर से पानी लाना पडता था । उनमे से एक घड़ा कहीं से फूटा हुआ था जबकि दूसरा बिल्कुल सही था, इस वजह से रोज़ घर पहुँचते-पहुँचते किसान के पास डेढ़ घड़ा पानी ही बच पाता था । ऐसा दो सालों से चल रहा था ।
 
            सही घड़े को इस बात का गुरूर था कि वो पूरा का पूरा पानी घर पहुंचता है और उसके अन्दर कोई कमी नहीं है, वहीँ दूसरी तरफ फूटा घड़ा इस बात से शर्मिंदा रहता था कि वो आधा पानी ही घर तक पंहुचा पाता है और किसान की मेहनत बेकार चली जाती है । फूटा घड़ा ये सब सोच कर बहुत परेशान रहने लगा और एक दिन उससे रहा नहीं गया, उसने किसान से कहा, “ मैं खुद पर शर्मिंदा हूँ और आपसे क्षमा मांगना चाहता हूँ ?”
 
            "क्यों ?"   किसान ने पूछा - “ तुम किस बात से शर्मिंदा हो ?”

           “शायद आप नहीं जानते पर मैं एक जगह से फूटा हुआ हूँ, और पिछले दो सालों से मुझे जितना पानी घर पहुँचाना चाहिए था  उसका आधा ही पहुंचा पाया हूँ, मेरे अन्दर ये बहुत बड़ी कमी है और इस वजह से आपकी मेहनत बर्वाद होती रही है ।”  फूटे घड़े ने दुखी होते हुए कहा ।
            किसान को घड़े की बात सुनकर थोडा दुःख हुआ और वह बोला, कोई बात नहीं, मैं चाहता हूँ कि आज लौटते वक़्त तुम रास्ते में पड़ने वाले सुन्दर फूलों को देखो ।”
 
            घड़े ने वैसा ही किया, वह रास्ते भर सुन्दर फूलों को देखता आया, ऐसा करने से उसकी उदासी कुछ दूर हुई पर घर पहुँचते–पहुँचते फिर उसके अन्दर से आधा पानी गिर चुका था, वो फिर मायूस हो गया और किसान से क्षमा मांगने लगा ।
 
            किसान बोला,” शायद तुमने ध्यान नहीं दिया कि पूरे रास्ते में जितने भी फूल थे वो बस तुम्हारी तरफ ही थे, सही घड़े की तरफ एक भी फूल नहीं था । ऐसा इसलिए क्योंकि मैं हमेशा से तुम्हारे अन्दर की कमी को जानता था, और मैंने उसका लाभ उठाया । मैंने तुम्हारे तरफ वाले रास्ते पर रंग-बिरंगे फूलों के बीज बो दिए थे, तुम रोज़ थोडा-थोडा कर के उन्हें सींचते रहे और पूरे रास्ते को इतना खूबसूरत बना दिया । आज तुम्हारी वजह से ही मैं इन फूलों को भगवान को अर्पित कर पाता हूँ और अपना घर सुन्दर बना पाता हूँ । तुम्हीं सोचो अगर तुम जैसे हो वैसे नहीं होते तो भला क्या मैं ये सब कुछ कर पाता ?”
 
            दोस्तों हम सभी के अन्दर कोई ना कोई कमी होती है, पर यही कमियां हमें अनोखा बनाती हैं । उस किसान की तरह हमें भी हर किसी को जो जैसा है वैसे ही स्वीकारना चाहिए और उसकी अच्छाई की तरफ ध्यान देना चाहिये और जब हम ऐसा करेंगे तब “फूटा घड़ा” भी मूल्यवान हो जायेगा ।

Monday, January 9, 2017

40 पार के बाद सुखमय वृद्धावस्था के लिए यह भी याद रखें...


        40 वर्ष से अधिक उम्र वाले सभी व्यक्ति इस सन्देश को विशेष ध्यान से पढ़ें, क्योंकि यह उनके आने वाले जीवन के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है ।

        1.  जहाँ तक संभव हो अपने स्वयं के स्थायी निवास में ही रहें जिससे कि स्वतंत्र जीवन जीने का आनंद बगैर किसी बाधा के ले सकें ।  (एक कहावत है - अपना घर हंग-हंग भर, दूसरे का घर थूकने का डर)

          2.  अपना बैंक बेलेंस और भौतिक संपत्ति अपने पास रखें । परिजनों के अति प्रेम में पड़कर किसी के नाम करने की ना सोचें ।

          3.  अपने बच्चों के इस वादे पर निर्भर ना रहें कि वो वृद्धावस्था में आपकी सेवा करेंगे, क्योंकि समय बदलने के साथ उनकी प्राथमिकताएँ भी बदल जाती हैँं और कई बार चाहते हुए भी वे कुछ नहीं कर पाते ।

          4.  उन लोगों को अपने मित्र समूह में शामिल रखें जो आपके जीवन को प्रसन्न देखना चाहते हैं, यानी सच्चे हितैषी हों । 

          5.  किसी के साथ अपनी तुलना ना करें और ना ही किसी से कोई उम्मीद रखें ।

         6.  अपनी संतानों के जीवन में दखल अन्दाजी ना करें, उन्हें अपने तरीके से अपना जीवन जीने दें और आप अपने तरीके से अपना जीवन जिएँ ।

          7.  अपनी वृद्धावस्था को आधार बनाकर किसी से सेवा करवाने, सम्मान पाने का प्रयास  ना करें ।

           8.  लोगों की बातें सुनें लेकिन अपने स्वतंत्र विचारों के आधार पर निर्णय लें ।

           9.  प्रार्थना करें लेकिन भीख ना मांगे, यहाँ तक कि भगवान से भी नहीं । अगर भगवान से कुछ मांगे तो सिर्फ माफ़ी और हिम्मत ।

          10.  अपने स्वास्थ्य का स्वयं ध्यान रखें, चिकित्सीय परीक्षण के अलावा अपने आर्थिक सामर्थ्य अनुसार अच्छा पौष्टिक भोजन खाएं और यथा सम्भव अपना काम अपने हाथों से करें । छोटे कष्टों पर ध्यान ना दें, उम्र के साथ छोटी मोटी शारीरिक परेशानीयां चलती रहती हैं ।

          11.  अपने जीवन को उल्लास से जीने का प्रयत्न करें खुद प्रसन्न रहने की चेष्टा करें और दूसरों को प्रसन्न रखें ।

          12.  प्रति वर्ष  अपने जीवन  साथी केे साथ भ्रमण/ छोटी यात्रा पर एक या अधिक बार अवश्य जाएं,  इससे आपका जीने का नजरिया बदलेगा ।

          13.   किसी भी टकराव को टालें एवं तनाव रहित जीवन जिऐं ।

          14.   जीवन में स्थायी कुछ भी नहीं है चिंताएं भी नहीं इस बात का विश्वास करें ।

        15.  अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को रिटायरमेंट तक  पूरा कर लें, याद रखें जब तक आप अपने लिए जीना शुरू नहीं करते हैं तब तक आप जीवित नहीं हैं ।

 खुशनुमा जीवन की शुभकामनाओं के साथ...


Tuesday, January 3, 2017

प्रेरणा कैसी-कैसी...


           किसी समय एक राजा था जिसे राज भोगते काफी समय हो गया था बाल भी सफ़ेद होने लगे थे । एक दिन उसने अपने दरबार में उत्सव रखा । उत्सव मे मुजरा करने वाली के साथ दूर देश के राजाओं को भी अपने गुरु के साथ बुलाया । कुछ मुद्राएँ राजा ने यह सोचकर अपने गुरु को दी कि जो बात मुजरा करने वाली की अच्छी लगेगी वहाँ गुरु स्वयं ये मुद्राएँ देंगे । 
 
           सारी रात मुजरा चलता रहा । सुबह होने वाली थीं, मुज़रा करने वाली ने देखा मेरा तबले वाला ऊँघ रहा है उसको जगाने के लियें मुज़रा करने वाली ने एक दोहा पढ़ा-

"बहु बीती, थोड़ी रही, पल पल गयी बिहाई ।
एक पलक के कारने, ना कलंक लग जाए।"
 
           अब इस दोहे का अलग-अलग व्यक्तियों ने अपने-अपने अनुरूप अर्थ निकाला ।
 
           तबले वाला सतर्क होकर  बजाने लगा ।
 
           जब ये बात गुरु ने सुनी तो गुरु ने अपने पास की सारी मोहरें उस मुज़रा करने वाली को दे दी ।
 
           वही दोहा उसने फिर पढ़ा तो राजा की लड़की ने अपना नवलखा हार उसे दे दिया ।
 
           जब वही दोहा नर्तकी ने फिर दोहराया तो राजा के लड़के ने अपना मुकट उतारकर दे दिया । 
 
           जब वह उस दोहे को फिर दोहराने लगी तो राजा ने कहा अब बस भी कर एक दोहे से तुने वेश्या होकर भी सबको लूट लिया है ।
 
           जब ये बात राजा के गुरु ने सुनी तो गुरु के नेत्रों मे जल आ गया और वो कहने लगे, "राजन् इसे तू वेश्या न कह, ये मेरी गुरू है । इसने मुझें मत दी है कि मै सारी उम्र जंगलो मे भक्ति करता रहा और आखरी समय मे मुज़रा देखने आ गया । भाई मैं तो चला ।
 
           राजा की लड़की ने कहा, "आप मेरी शादी नहीं कर रहे थे,  आज मुझे आपके महावत के साथ भागकर अपना जीवन बर्बाद कर लेना था । इसने मुझे सुमति दी है कि कभी तो तेरी शादी होगी । क्यों अपने पिता को कलंकित करती है ?"
 
           राजा के लड़के ने कहा, "आप मुझे राज नहीं दे रहे थे । मैंने आपके सिपाहियो से मिलकर आपका क़त्ल करवा देना था । इसने समझाया है कि आखिर राज तो तुम्हें ही मिलना है । क्यों अपने पिता के खून का इलज़ाम अपने सर लेते हो ?
 
           जब ये बातें राजा ने सुनी तो राजा ने सोचा क्यों न मै अभी ही ये राजतिलक कर दूँ, गुरु भी मौजूद हैं । उसी समय राजकुमार का राजतिलक कर दिया और राजकुमारी से कहा बेटी, "मैं जल्दी ही आपकी शादी भी कर दूँगा।"
 
           तब नर्तकी कहने लगी, "मेरे एक दोहे से इतने लोग सुधर गए, पर मैं तो ना सुधरी । इसलिये आज से मैं भी अपना धंधा बंद कर प्रभु ! आज से मै भी तेरा नाम सुमिरन करुँगी ।

           समझ आने की बात है, दुनिया बदलते देर नहीं लगती । एक दोहे की दो लाईनों में जब इतना सामर्थ्य जुट सकता है तो बडी से बडी समस्या में भी बस थोड़ा धैर्य रखने की ज़रूरत होती है...
 

Thursday, December 15, 2016

तनाव से बचाव...

            
            दोस्तों का एक पुराना ग्रुप कॉलेज छोड़ने के बहुत दिनों बाद मिला ।  सभी मित्र अच्छे केरियर के साथ पर्याप्त पैसे कमा रहे थे । वे अपने सबसे फेवरेट प्रोफेसर के घर जाकर मिले । प्रोफेसर साहब उनके काम के बारे में पूछने लगे । धीरे-धीरे बात लाइफ में बढ़ती स्ट्रेस और काम के प्रेशर पर आ गयी । यहाँ इस मुद्दे पर सभी एक मत थे कि, भले वे अब आर्थिक रूप से बहुत मजबूत हों पर उनकी लाइफ में अब वो मजा नहीं रह गया जो पहले हुआ करता था ।

           प्रोफेसर साहब बड़े ध्यान से उनकी बातें सुन रहे थे,  वे अचानक ही उठे और थोड़ी देर बाद किचन से लौटे और बोले, "डीयर स्टूडेंट्स, मैं आपके लिए गरमा-गरम कॉफ़ी बना कर आया हूँ, लेकिन प्लीज आप सब किचन में जाकर अपने-अपने लिए कप्स लेते आइये।"

            लड़के तेजी से अंदर गए, वहाँ कई तरह के कप रखे हुए थे, सभी अपने लिए अच्छा से अच्छा कप उठाने में लग गये, किसी ने क्रिस्टल का शानदार कप उठाया तो किसी ने पोर्सिलेन का कप सेलेक्ट किया, और किसी ने शीशे का कप उठाया।  
             
            सभी के हाथों में कॉफी आ गयी तो प्रोफ़ेसर साहब बोले, "अगर आपने ध्यान दिया हो तो, जो कप दिखने में अच्छे और महंगे थे आपने उन्हें ही चुना और साधारण दिखने वाले कप्स की तरफ ध्यान नहीं दिया । जहाँ एक तरफ अपने लिए सबसे अच्छे की चाह रखना एक नॉर्मल बात है, वहीँ दूसरी तरफ ये चाहत ही हमारी लाइफ में प्रॉब्लम्स और स्ट्रेस भी लेकर आता है ।

             फ्रेंड्स, ये तो पक्का है कि कप, कॉफी की क्वालिटी में कोई बदलाव नहीं लाता । ये तो बस एक जरिया है जिसके माध्यम से आप कॉफी पीते है । असल में जो आपको चाहिए था वो बस कॉफ़ी थी, कप नहीं, पर फिर भी आप सब सबसे अच्छे कप के पीछे ही गए और अपना लेने के बाद दूसरों के कप निहारने लगे।" 

           अब इस बात को ध्यान से सुनिये "ये लाइफ कॉफ़ी की तरह है; हमारी नौकरी, पैसा, पोजीशन, कप की तरह हैं । ये बस लाइफ जीने के साधन हैं, खुद लाइफ नहीं ! और हमारे पास कौन सा कप है ये न हमारी लाइफ को डिफाइन करता है और ना ही उसे चेंज करता है । कॉफी की चिंता करिये कप की नहीं ।"

            "दुनिया के सबसे खुशहाल लोग वो नहीं होते जिनके पास सबकुछ सबसे बढ़िया होता है, बल्कि वे होते हैं, जिनके पास जो कुछ भी होता है वे बस उसका अच्छे से इस्तेमाल करते हैं, एन्जॉय करते हैं और भरपूर जीवन जीते हैं ! सादगी से जियो, सबसे प्रेम करो, सबकी केअर करो, जीवन का आनन्द लो । यही भरपूर आनंद के साथ जीवन जीने का सही तरीका है । Enjoy your  Life.
सोर्स - WhatsApp.

Tuesday, August 23, 2016

प्रेरणा...!


           अमेरिका की बात है, एक युवक को व्यापार में बहुत नुकसान उठाना पड़ा, उसपर बहुत कर्ज चढ़ गया,  तमाम जमीन-जायदाद गिरवी रखना पड़ी,  दोस्तों ने भी मुंह फेर लिया, जाहिर हैं वह बहुत हताश था, कहीं से कोई राह नहीं सूझ रही थी, आशा की कोई किरण बाकि न बची थी । एक दिन वह एक Park में बैठा अपनी परिस्थितियो पर चिंता कर रहा था, तभी एक बुजुर्ग वहां पहुंचे. कपड़ो से और चेहरे से वे काफी अमीर लग रहे थे ।

           बुजुर्ग ने चिंता का कारण पूछा तो उसने अपनी सारी कहानी बता दी - बुजुर्ग बोले - "चिंता मत करो, मेरा नाम जॉन डी. रॉकफेलर है, मैं तुम्हे नहीं जानता, पर तुम मुझे सच्चे और ईमानदार लग रहे हो, इसलिए मैं तुम्हे दस लाख डॉलर का कर्ज देने को तैयार हूँ ।”


           फिर जेब से चेकबुक निकाल कर उन्होंने रकम दर्ज की और उस व्यक्ति को देते हुए बोले- “नौजवान, आज से ठीक एक साल बाद हम इसी जगह मिलेंगे  तब तुम मेरा कर्ज चुका देना ।”  इतना कहकर वो चले गए । युवक चकित था. रॉकफेलर तब अमेरीका के सबसे अमीर व्यक्तियों में से एक थे, युवक को तो भरोसा ही नहीं हो रहा था की उसकी लगभग सारी मुश्किलें हल हो गई हैं ।


           उसके पैरो को पंख लग गये, घर पहुंचकर वह अपने कर्जों का हिसाब लगाने लगा,  बीसवी सदी की शुरुआत में 10 लाख डॉलर बहुत बड़ी धनराशि होती थी और आज भी है । अचानक उसके मन में ख्याल आया, उसने सोचा एक अपरिचित व्यक्ति ने मुझ पर भरोसा किया, पर मैं खुद पर भरोसा नहीं कर रहा हूँ,  यह ख्याल आते ही उसने चेक को संभाल कर रख लिया,  फिर उसने निश्चय किया की पहले वह अपनी तरफ से पूरी कोशिश करेगा, पूरी मेहनत करेगा की इस मुश्किल से निकल जाए, उसके बाद भी अगर कोई चारा न बचे तो वो उस चैक का इस्तेमाल करेगा ।


           उस दिन के बाद युवक ने खुद को झोंक दिया. बस एक ही धुन थी, किसी तरह सारे कर्ज चुकाकर अपनी प्रतिष्ठा को फिर से पाना हैं । उसकी कोशिशे रंग लाने लगी. कारोबार उबरने लगा, कर्ज चुकने लगा । साल भर बाद तो वो पहले से भी अच्छी स्तिथि में था । निर्धारित दिन ठीक समय वह बगीचे में पहुँच गया, वह चेक लेकर रॉकफेलर की राह देख ही रहा था की वे दूर से आते दिखे, जब वे पास पहुंचे तो युवक ने बड़ी श्रद्धा से उनका अभिवादन किया, उनकी ओर चेक बढाकर उसने कुछ कहने के लिए मुंह खोल ही था की एक नर्स भागते हुए आई और झपट्टा मरकर उस वृद्ध को पकड़ लिया ।


            युवक हैरान रह गया । तब वह नर्स बोली, “यह पागल बार बार पागलखाने से भाग जाता है और लोगों को जॉन डी. रॉकफेलर के रूप में चैक बाँटता फिरता हैं ।” अब तो वह युवक पहले से भी ज्यादा हैरान हो गया । जिस चैक के बल पर उसने अपना पूरा डूबता कारोबार फिर से खड़ा कर लिया वह फर्जी था ।


           पर यह बात जरुर साबित हुई की वास्तविक जीत हमारे इरादे, हौंसले और प्रयास में ही होती है,  यदि हम खुद पर विश्वास रखें और आवश्यकता के मुताबिक प्रयत्न करते रहें तो यक़ीनन किसी भी बाधा अथवा चुनौति से निपट सकते है ।



Monday, June 20, 2016

सकारात्मक या नकारात्मक...?



            वर्षों पूर्व मेरे ससुराल के 40-45 वर्ष के आसपास की उम्र के दो रिश्तेदार ।  दोनों ही सीने में दर्द के रोगी, और दोनों ही मुझे ससुराल पक्ष के होने के कारण कंवर साब कहकर सम्बोधित करते थे । एक जब भी मिलते कहते - कंवर साब मेरा क्या भरोसा ? दूसरे जब भी मिलते कहते - अरे कंवर साब जब भी सीने में दर्द उठता है मैं बाम बगैरह लगा लेता हूँ, कुछ देर आराम कर लेता हूँ और फिर अपने काम पर लग जाता हूँ और बिल्कुल सत्य घटना यह घटी कि जो कहते थे मेरा क्या भरोसा ?  वो उतनी ही जल्दी इस दुनिया को अलविदा कर गये, जबकि बाम वगैरह लगाकर आराम करके अपने काम पर लग जाने वाले आज भी उसी स्थिति में किंतु मानसिक रुप से मजे में अपनी जिन्दगी गुजार रहे हैं ।

            वाकया याद यूं भी आया कि मेरे एक अभिन्न मित्र अच्छा कमाने-खाने के बावजूद हर जगह, हर परिस्थिति में नकारात्मकता को ही देखते हैं । नजदीकी सम्बन्धों में भी उन विषयों तक में जिनका न तो उनसे कोई लेना-देना हो, और न ही उनसे उस बारे में उनकी कोई राय मांगी गई हो, किंतु फिर भी बेवजह बीच में कूदना और अपनी नकारात्मक शैली में उस व्यक्ति की ही छिछालेदारी करने लगना जो उन्हें अपना सर्वाधिक घनिष्ठ मानता रहा हो । नतीजा - वर्ष भर में उनके दो मंहगे और बडे आकार के ऑपरेशन हो गये । तमाम मितव्ययिता के बावजूद रास्ते चलते दो-तीन लाख रुपये के खर्च में भी आ गये किंतु आदत है कि छूटती नहीं और कहीं भी अपनी नकारात्मक शैली में पूरी वजनदारी के साथ घुसपैठ कर ही बैठते हैं । अपनी इसी कमी के कारण ये इनकी नजदीकी रिश्तेदारी में भी अच्छे-खासे उपेक्षित ही रहते हैं किंतु आदत है कि "दिल है के मानता नहीं" की तर्ज पर कभी छूटती नहीं ।

            निःसंदेह जिंदगी में हमारा नजरिया ही हमारा मार्ग और हमारा भाग्य निर्धारित करता है । हो सकता है कि नकारात्मक सोच को प्रधानता देते रहने वाले लोगों के जीवन में कुछ वाकये ऐसे कभी गुजरे हों जिन्होंने हमेशा के लिये उनकी सोच का मार्ग यह बना दिया हो, यह भी हो सकता है कि उन्हें अपने पूर्वजों से विरासत में ही सोचने का यही तरीका मिला हो किंतु दोनों ही स्थितियों में इसके नुकसान तो इन्हें ही उठाने पडते हैं जिनकी  सोच-शैली नकारात्मक हो जाती है । प्रश्न तब यह उठता है कि ऐसे में क्या किया जावे कि हमारे अपने जीवन से इस मनहूसियत को हम दूर कर पाएं क्योंकि मुद्दे यदि सिर्फ दो हैं तो इसका मतलब देश व दुनिया की कमोबेश लगभग आधी आबादी इस समस्या से पूर्णतः या अंशतः ग्रसित है...

            कुछ उपाय जो इस स्थिति से बचाव के सामने आते हैं वे यहाँ प्रस्तुत करने का प्रयास है...

अन्धेरों से घिरे हों तो घबराएं नहीं, 
क्योंकि सितारों को चमकने के लिए घनी रात ही चाहिए होती है, दिन की रोशनी नहीं ।
            
            कैसे करें नकारात्मक सोच को सकारात्मक में परिवर्तित ?

            
“क्योंकि हम जो सोचते हैं, वो ही बन भी जाते हैं”

            Law Of Attraction (LOA) अर्थात् आकर्षित करने का नियम कहता है कि हम जो भी सोचते हैं उसे अपने जीवन में आकर्षित करते हैं, फिर चाहे वो चीज अच्छी हो या बुरी । उदाहरण के लिए- अगर कोई सोचता है कि वो हमेशा परेशान रहता है, बीमार रहता है और उसके पास पैसों कि कमी रहती है तो असल जिंदगी में भी ब्रह्माण्ड घटनाओं को कुछ ऐसे सेट करता है कि उसे अपने जिंदगी में परेशानी, बीमारी और तंगी का सामना करना ही पड़ता है । वहीँ दूसरी तरफ अगर वो सोचता है कि वो खुशहाल है, सेहतमंद है और उसके पास बहुत पैसे हैं तो LOA कि वजह से असल जिंदगी में भी उसे खुशहाली, अच्छी सेहत और समृद्धि देखने को मिलने लगती है ।

            “हम वो हैं जो हमें हमारी सोच ने बनाया है, इसलिए इस बात का ध्यान रखिये कि आप क्या सोचते हैं. शब्द गौण हैं, किंतु विचार हैं, जो दूर तक यात्रा करते हैं” जो लोग LOA मानते हैं वे समझते हैं कि सकारात्मक सोचना कितना ज़रूरी है…  

            वे जानते हैं कि हर एक नकारात्मक सोच हमारे जीवन को सकारात्मकता से दूर ले जाती है और हर एक सकारात्मक सोच जीवन में खुशियां लाती है । किसी ने कहा भी है-  ”अगर इंसान जानता कि उसकी सोच कितनी पावरफुल है - तो वो कभी नकारात्मक नहीं सोचता !”

            परन्तु क्या हमेशा सकारात्मक सोचना संभव है ? यहीं पर काम आते हैं  हमारे  लेकिन, किन्तु, परन्तु...

            प्रायः ये शब्द ज्यादातर नकारात्मक सोच में प्रयुक्त  होते हैं  । आप लोगों को कहते सुन सकते हैं - मैं सफल हो जाता लेकिन..., सब सही चल रहा था किन्तु..., पर ऐसे शब्दों के प्रयोग में नकारात्मकता के अंत में कुछ वृद्धि करके उन्हें सकारात्मक सोच में परिवर्तित कर सकते हैं । इसे कुछ उदाहरण से समझते हैं- 

             जैसे ही आपके मन में विचार आये, “दुनिया बहुत बुरी है”  तो आप इतना कह कर या सोच कर रुके नहीं, तुरंत महसूस करें कि आपने एक नकारात्मक शब्द बोला है इसलिए तुरंत सचेत हो जाएं और वाक्य को कुछ ऐसे पूरा करें-  ”दुनिया बहुत बुरी है, लेकिन अब चीजें बदल रही हैं, बहुत से अच्छे लोग समाज में अच्छाई का बीज बो रहे हैं और सब ठीक हो रहा है“

            कुछ और उदाहरण देखते हैं-

            मैं पढ़ने में कमजोर हूँ...लेकिन अब मैंने मेहनत शुरू कर दी है और जल्द ही मैं पढ़ाई में भी अच्छा हो जाऊँगा ।

            मेरे अफसर बहुत जालिम हैं... पर धीरे -धीरे वो बदल रहे हैं और उन्हें ज्ञान भी बहुत है, मुझे काफी कुछ सीखने को मिलता है उनसे ।

            मेरे पास पैसे नहीं हैं...लेकिन मुझे पता है मेरे पास बहुत पैसा आने वाला है, इतना कि न मैं सिर्फ अपने बल्कि अपने अपनों के भी सपने पूरे कर सकूँ ।

            मेरे साथ हमेशा बुरा होता आया है...लेकिन मैं देख रहा हूँ कि पिछले कुछ दिनों से सब अच्छा अच्छा ही हो रहा है, और आगे भी होगा ।

            मेरे बच्चे की शादी नहीं हो रही...परंतु अब मौसम शादीयों का है, भाग्य ने उसके लिए बहुत ही बेहतरीन रिश्ता सोच रखा होगा, जो जल्द ही तय होगा ।

            मित्रों... यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात ये महसूस करना है कि कब आपके मन में एक नकारात्मक सोच आई है और तुरंत सावधान हो कर व इसे- “लेकिन” लगा कर सकारात्मक सोच में परिवर्तित कर देना है, और ये आपको सिर्फ तब नहीं करना जब आप किसी के सामने बात कर रहे हों, बल्कि सबसे अधिक तो आपको ये अकेले रहते हुए अपने साथ करना है, आपको अपनी सोच पर ध्यान देना है, सावधान रहना है कि आपकी सोच सकारात्मक है या नकारात्मक ?  और जैसे ही नकारात्मक सोच आये आपको तुरंत उसे सकारात्मक में परिवर्तित कर देना है । तब आप इस बात की चिंता ना करें की आपने ‘लेकिन‘ के बाद जो लाइन जोड़ी है वो सही है या गलत, 

            आपको तो बस एक सकारात्मक वाक्य जोड़ना है, और आपका अवचेतन मस्तिष्क उसे ही सही मानेगा और ब्रह्माण्ड आपके जीवन में वैसे ही अनुभव प्रस्तुत करेगा !

            वैसे देखने में ये आसान लग सकता है ! हो सकता है ये आपको बड़ा सामान्य भी लगे, कुछ लोगों के लिए वाकई में हो भी, पर अधिकांश लोगों के लिए विचारों को नियंत्रित करना और उनके प्रति सतर्क बने रहना चैलेंजिंग ही होता है । इसलिए अगर आप इस तरीके को आजमाते वक़्त कई बार नकारात्मक सोच को miss भी कर जाते हैं तो चिंता न करें...

            जैसे तमाम चीजों को अभ्यास से सही किया जा सकता है वैसे ही अपने विचारों को भी अभ्यास से सकारात्मकता की ओर परिवर्तित किया जा सकता है ।
 
यहाँ इस चित्र को ध्यान से देखें...!  


Friday, June 17, 2016

मनोस्थिति : सुख या दु:ख...




एक महान लेखक अपने लेखन कक्ष में बैठा लिख रहा था –

     पिछले वर्ष मेरा आपरेशन हुआ और मेरा गाल ब्लाडर निकाल दिया गया जिसके कारण एक बडे अनावश्यक खर्च के साथ मुझे लम्बे समय तक बिस्तर पर पडे रहना पडा ।

     इसी वर्ष मैं 60 वर्ष का हुआ और मेरी पसंदीदा प्रकाशन संस्थान की वह नौकरी भी चली गई जहाँ मैं पिछले 30 वर्षों से कार्यरत था ।

     अपने पिता की मृत्यु का दु:ख भी मुझे इसी वर्ष में झेलना पडा ।

     और इसी वर्ष में मेरा बेटा कार एक्सीडेंट के कारण बहुत दिनों तक अस्पताल में भर्ती रहने से अपनी मेडिकल की परीक्षा में फेल हो गया । कार की टूट-फूट का नुकसान अलग हुआ ।

     अंत में लेखक ने लिखा – यह बहुत ही बुरा साल था ।

     जब उसकी पत्नी लेखन कक्ष में आई तो उसने देखा कि कलम हाथ में लिये बैठा उसका पति अपने विचारों में खोया बहुत दु:खी लग रहा था । अपने पति की कुर्सी के पीछे खडे रहकर उसने देखा और पढा कि वो क्या लिख रहा था ।

     वह चुपचाप उसके कक्ष से बाहर निकल गई और कुछ देर बाद एक लिखे हुए दूसरे कागज के साथ वापस लौटकर आई और वह कागज भी पति के लिखे कागज के बगल में रखकर बाहर निकल गई ।

     लेखक ने पत्नी के द्वारा रखे कागज पर कुछ लिखा देखकर उसे पढा तो उसमें लिखा था-

     पिछले वर्ष आखिर मुझे उस गाल ब्लाडर से छुटकारा मिल गया जिसके कारण मैं कई सालों दर्द से परेशान रहा ।

     इसी वर्ष अपनी 60 साल की उम्र पूरी कर स्वस्थ-दुरुस्त अवस्था में अपनी प्रकाशन कम्पनी की नौकरी से सेवानिवृत्त हुआ । अब मैं पूरा ध्यान लगाकर शांति के साथ अपने समय का उपयोग और भी बेहतर लेखन-पठन के लिये कर सकूंगा ।

     इसी साल में मेरे 95 वर्षीय पिता बगैर किसी पर आश्रित हुए और बिना किसी गंभीर बीमारी का दु:ख भोगे अपनी उम्र पूरी कर परमात्मा के पास चले गये ।

     और इसी वर्ष भगवान ने एक बडे एक्सीडेंट के बावजूद मेरे बेटे की रक्षा भी की । भले ही कार में बडा नुकसान हुआ किन्तु मेरे बेटे का न सिर्फ जीवन बल्कि उसके हाथ-पैर भी सब सही-सलामत रहे ।

     अंत में उसकी पत्नी ने लिखा था – इस साल ईश्वर की हम पर बहुत कृपा रही, साल अच्छा बीता ।

     तो देखा आपने – सोचने का नजरिया बदलने पर कितना कुछ बदल जाता है । स्थितियाँ तो वही रहती है किंतु आत्म संतोष कितना मिलता है ।