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Tuesday, January 3, 2017

प्रेरणा कैसी-कैसी...


           किसी समय एक राजा था जिसे राज भोगते काफी समय हो गया था बाल भी सफ़ेद होने लगे थे । एक दिन उसने अपने दरबार में उत्सव रखा । उत्सव मे मुजरा करने वाली के साथ दूर देश के राजाओं को भी अपने गुरु के साथ बुलाया । कुछ मुद्राएँ राजा ने यह सोचकर अपने गुरु को दी कि जो बात मुजरा करने वाली की अच्छी लगेगी वहाँ गुरु स्वयं ये मुद्राएँ देंगे । 
 
           सारी रात मुजरा चलता रहा । सुबह होने वाली थीं, मुज़रा करने वाली ने देखा मेरा तबले वाला ऊँघ रहा है उसको जगाने के लियें मुज़रा करने वाली ने एक दोहा पढ़ा-

"बहु बीती, थोड़ी रही, पल पल गयी बिहाई ।
एक पलक के कारने, ना कलंक लग जाए।"
 
           अब इस दोहे का अलग-अलग व्यक्तियों ने अपने-अपने अनुरूप अर्थ निकाला ।
 
           तबले वाला सतर्क होकर  बजाने लगा ।
 
           जब ये बात गुरु ने सुनी तो गुरु ने अपने पास की सारी मोहरें उस मुज़रा करने वाली को दे दी ।
 
           वही दोहा उसने फिर पढ़ा तो राजा की लड़की ने अपना नवलखा हार उसे दे दिया ।
 
           जब वही दोहा नर्तकी ने फिर दोहराया तो राजा के लड़के ने अपना मुकट उतारकर दे दिया । 
 
           जब वह उस दोहे को फिर दोहराने लगी तो राजा ने कहा अब बस भी कर एक दोहे से तुने वेश्या होकर भी सबको लूट लिया है ।
 
           जब ये बात राजा के गुरु ने सुनी तो गुरु के नेत्रों मे जल आ गया और वो कहने लगे, "राजन् इसे तू वेश्या न कह, ये मेरी गुरू है । इसने मुझें मत दी है कि मै सारी उम्र जंगलो मे भक्ति करता रहा और आखरी समय मे मुज़रा देखने आ गया । भाई मैं तो चला ।
 
           राजा की लड़की ने कहा, "आप मेरी शादी नहीं कर रहे थे,  आज मुझे आपके महावत के साथ भागकर अपना जीवन बर्बाद कर लेना था । इसने मुझे सुमति दी है कि कभी तो तेरी शादी होगी । क्यों अपने पिता को कलंकित करती है ?"
 
           राजा के लड़के ने कहा, "आप मुझे राज नहीं दे रहे थे । मैंने आपके सिपाहियो से मिलकर आपका क़त्ल करवा देना था । इसने समझाया है कि आखिर राज तो तुम्हें ही मिलना है । क्यों अपने पिता के खून का इलज़ाम अपने सर लेते हो ?
 
           जब ये बातें राजा ने सुनी तो राजा ने सोचा क्यों न मै अभी ही ये राजतिलक कर दूँ, गुरु भी मौजूद हैं । उसी समय राजकुमार का राजतिलक कर दिया और राजकुमारी से कहा बेटी, "मैं जल्दी ही आपकी शादी भी कर दूँगा।"
 
           तब नर्तकी कहने लगी, "मेरे एक दोहे से इतने लोग सुधर गए, पर मैं तो ना सुधरी । इसलिये आज से मैं भी अपना धंधा बंद कर प्रभु ! आज से मै भी तेरा नाम सुमिरन करुँगी ।

           समझ आने की बात है, दुनिया बदलते देर नहीं लगती । एक दोहे की दो लाईनों में जब इतना सामर्थ्य जुट सकता है तो बडी से बडी समस्या में भी बस थोड़ा धैर्य रखने की ज़रूरत होती है...
 

Friday, June 3, 2016

जंजाल जिन्दगी के...

            वर्तमान प्रतिस्पर्धी युग में एक ओर निरन्तर बढती मँहगाई, दूसरों को स्वयं से ज्यादा कमाते हुए देखना, खुद अपनी आय नहीं बढा पाना, परिवारजनों के लिये सब कुछ करते रहने के बावजूद उनके द्वारा स्वयं की मौके-बेमौके अवहेलना भी झेलना और ऐसे ही अनेकों ज्ञात-अज्ञात अवसरों पर प्रसन्नता के लिये निरन्तर प्रयत्नशील रहने के बावजूद किसी भी प्रकार की प्रसन्नता से कोसों दूर रह जाना जैसी थोक में समस्याएँ आज हममें से लगभग हर किसी को किसी न किसी बदले हुए स्वरुप में निरन्तर झेलते हुए अपनी जिन्दगी बिताना पड रही है ।

            परिणामतः हर समय खिन्न व उद्विग्न रहना, क्या करना ?  कैसे करना ? जिससे कि न सिर्फ स्वयं के जीवन में बल्कि परिवारजनों में भी सन्तुष्टि का लेवल कुछ बढाया जा सके जैसी अगनित समस्याओं के दबाव में नाना प्रकार की छोटी-मोटी बीमारियों को भी अपने गले ओढ लेने के बाद भी जी के जंजाल जैसी दिखाई पडने वाली इन समस्याओं के बीच प्रसन्नता के वास्तविक पल कैसे निकाले जा सकें, इस चिंतन का थोडा सा समाधान इस जानी-पहचानी कहानी में थोडा-बहुत दिखाई देने के कारण यह कथासार आपके साथ इस पोस्ट के द्वारा शेअर करने का प्रयास किया है । आईये पहले इस कथा को ही एक बार फिर से अपने मस्तिष्क में रिवाईज करलें-
            किसी  शहर  में, एक आदमी प्राइवेट  कंपनी  में  जॉब  करता था, वो  अपनी  ज़िन्दगी  से  कतई खुश  नहीं  था, हर  समय  वो  किसी  न  किसी  समस्या  से  परेशान  रहता  था ।

            एक बार  शहर  से  कुछ  दूरी  पर  एक  महात्मा  का  काफिला  रुका,  शहर  में  चारों  और  उन्ही की चर्चा चलते हुए दिख रही थी ।  बहुत  से  लोग  अपनी  समस्याएं  लेकर  उनके  पास  पहुँचने  लगे ।

            उस आदमी  ने  भी  महात्मा  के  दर्शन  करने  का  निश्चय  किया - और छुट्टी के दिन सुबह-सुबह ही उनके  काफिले  तक  पहुंचा । बहुत इंतज़ार  के  बाद उसका  का  नंबर  आया...
            वह  बाबा  से  बोला - ”बाबा, मैं  अपने  जीवन  से  बहुत  दुःखी  हूँ,  हर  समय ढेरों समस्याएं  मुझे  घेरें  रहती  हैं, कभी ऑफिस  की  टेंशन  रहती  है, तो  कभी  घर  पर  अनबन  हो  जाती  है, और  कभी  अपने  सेहत  को  लेकर  परेशान रहता  हूँ….

            बाबा  कोई  ऐसा  उपाय  बताइये  कि  मेरे  जीवन  से  सभी  समस्याएं  ख़त्म  हो  जाएं  और  मैं  चैन  से  जी सकूँ  ?

            बाबा  मुस्कुराये  और  बोले,  “पुत्र, आज तो बहुत देर  हो  गयी  है, मैं  तुम्हारे  प्रश्न  का  उत्तर  कल  सुबह दे सकूंगा । लेकिन क्या  तब तक तुम  मेरा  एक  छोटा  सा  काम  कर सकोगे ?”

            जी बाबा । उस आदमी ने महात्मा को जवाब दिया ।

            “हमारे  काफिले  में  सौ ऊंट हैं, मैं  चाहता हूँ  कि  आज  रात  तुम  इनका  खयाल  रख लो । जब ये सौ  के  सौ  ऊंट बैठ जाएं तो तुम भी सो जाना” ।

            ऐसा कहते  हुए महात्मा अपने तम्बू  में  चले  गए ।

            अगली सुबह जब महात्मा उस आदमी  से  मिले और उससे पुछा,  “कहो बेटा, रात नींद अच्छी आई ?”

            तो वो दुखी होते हुए बोला - “कहाँ बाबा, मैं तो एक पल के लिये भी नहीं सो पाया  । मैंने  बहुत  कोशिश  की  पर  मैं  सभी  ऊंटों को  नहीं  बैठा  पाया, कोई  न  कोई  ऊंट  खड़ा  हो  ही  जाता ।

           

            तब बाबा बोले,  “बेटा, कल  रात  तुमने  अनुभव  किया कि  चाहे  कितनी  भी  कोशिश  कर  लो  सारे  ऊंट  एक  साथ  बैठ ही नहीं सकते । तुम  एक  को  बैठाओगे  तो  कहीं  और  कोई  दूसरा  खड़ा  हो  जाएगा ।

            बस इसी  तरह तुम एक समस्या का समाधान  करोगे तो किसी कारणवश दूसरी खड़ी हो  जाएगी । जब तक जीवन है, ये समस्याएं तो  बनी  ही  रहती हैं, कभी  कम  तो  कभी  ज्यादा….”

            “तो  हमें  क्या  करना चाहिए ?”  उस आदमी  ने  जिज्ञासावश  पुछा । “इन  समस्याओं  के  बावजूद  जीवन  का  आनंद  लेना  सीखो…" 
            कल  रात  क्या  हुआ ? कई  ऊंट  रात होते-होते  खुद ही  बैठ  गए, कई  तुमने  अपने  प्रयास  से  बैठा  दिए, और बहुत  से  ऊंट तुम्हारे लगातार प्रयास  के  बाद  भी  नहीं बैठे । जबकि बाद  में  तुमने  पाया  कि उनमे से कुछ खुद ही  बैठ  गए…. कुछ  समझे …? 

            समस्याएं  भी  ऐसी  ही  होती  हैं - कुछ  तो  अपने आप ही ख़त्म  हो  जाती हैं,  कुछ  को  तुम  अपने  प्रयास  से  हल  कर लेते  हो, और कुछ  तुम्हारे  बहुत  कोशिश  करने  पर   भी  हल  नहीं  होतीं, ऐसी समस्याओं को समय के भरोसे पर  छोड़  दो । उचित  समय आने पर वे खुद ही ख़त्म हो  जाएंगी ।

            जीवन है, तो कुछ समस्याएं तो रहेंगी ही । पर  इसका  ये  मतलब  नहीं  की तुम  दिन  रात उन्ही  के  बारे  में  सोचते  रहो, समस्याओं को एक तरफ  रखो और  जीवन  का  आनंद  लो… चैन की नींद सोओ । जब भी उनका  समय  आएगा, तब वो  खुद  ही हल हो जाएँगी" ।