Friday, June 17, 2016

मनोस्थिति : सुख या दु:ख...




एक महान लेखक अपने लेखन कक्ष में बैठा लिख रहा था –

     पिछले वर्ष मेरा आपरेशन हुआ और मेरा गाल ब्लाडर निकाल दिया गया जिसके कारण एक बडे अनावश्यक खर्च के साथ मुझे लम्बे समय तक बिस्तर पर पडे रहना पडा ।

     इसी वर्ष मैं 60 वर्ष का हुआ और मेरी पसंदीदा प्रकाशन संस्थान की वह नौकरी भी चली गई जहाँ मैं पिछले 30 वर्षों से कार्यरत था ।

     अपने पिता की मृत्यु का दु:ख भी मुझे इसी वर्ष में झेलना पडा ।

     और इसी वर्ष में मेरा बेटा कार एक्सीडेंट के कारण बहुत दिनों तक अस्पताल में भर्ती रहने से अपनी मेडिकल की परीक्षा में फेल हो गया । कार की टूट-फूट का नुकसान अलग हुआ ।

     अंत में लेखक ने लिखा – यह बहुत ही बुरा साल था ।

     जब उसकी पत्नी लेखन कक्ष में आई तो उसने देखा कि कलम हाथ में लिये बैठा उसका पति अपने विचारों में खोया बहुत दु:खी लग रहा था । अपने पति की कुर्सी के पीछे खडे रहकर उसने देखा और पढा कि वो क्या लिख रहा था ।

     वह चुपचाप उसके कक्ष से बाहर निकल गई और कुछ देर बाद एक लिखे हुए दूसरे कागज के साथ वापस लौटकर आई और वह कागज भी पति के लिखे कागज के बगल में रखकर बाहर निकल गई ।

     लेखक ने पत्नी के द्वारा रखे कागज पर कुछ लिखा देखकर उसे पढा तो उसमें लिखा था-

     पिछले वर्ष आखिर मुझे उस गाल ब्लाडर से छुटकारा मिल गया जिसके कारण मैं कई सालों दर्द से परेशान रहा ।

     इसी वर्ष अपनी 60 साल की उम्र पूरी कर स्वस्थ-दुरुस्त अवस्था में अपनी प्रकाशन कम्पनी की नौकरी से सेवानिवृत्त हुआ । अब मैं पूरा ध्यान लगाकर शांति के साथ अपने समय का उपयोग और भी बेहतर लेखन-पठन के लिये कर सकूंगा ।

     इसी साल में मेरे 95 वर्षीय पिता बगैर किसी पर आश्रित हुए और बिना किसी गंभीर बीमारी का दु:ख भोगे अपनी उम्र पूरी कर परमात्मा के पास चले गये ।

     और इसी वर्ष भगवान ने एक बडे एक्सीडेंट के बावजूद मेरे बेटे की रक्षा भी की । भले ही कार में बडा नुकसान हुआ किन्तु मेरे बेटे का न सिर्फ जीवन बल्कि उसके हाथ-पैर भी सब सही-सलामत रहे ।

     अंत में उसकी पत्नी ने लिखा था – इस साल ईश्वर की हम पर बहुत कृपा रही, साल अच्छा बीता ।

     तो देखा आपने – सोचने का नजरिया बदलने पर कितना कुछ बदल जाता है । स्थितियाँ तो वही रहती है किंतु आत्म संतोष कितना मिलता है ।


प्रेरक सम्बन्ध...

    
            वैवाहिक वर्षगांठ की पूर्वसंध्या पर पति-पत्नी साथ में बैठे चाय की चुस्कियां ले रहे थे । संसार की दृष्टि में वो एक आदर्श युगल थे, दोनों में प्रेम भी बहुत था, लेकिन कुछ समय से ऐसा प्रतीत हो रहा था कि संबंधों पर समय की धूल जम रही है । शिकायतें धीरे-धीरे बढ़ रही थीं । 

            बातें करते-करते अचानक पत्नी ने एक प्रस्ताव रखा कि मुझे तुमसे बहुत कुछ कहना होता है लेकिन हमारे पास समय ही नहीं होता एक-दूसरे के लिए । इसलिए मैं दो डायरियाँ ले आती हूँ और हमारी जो भी शिकायत हो हम पूरा साल अपनी-अपनी डायरी में लिखेंगे व*अगले साल इसी दिन हम एक-दूसरे की डायरी पढ़ेंगे ताकि हमें पता चल सके कि हममें कौन-कौनसी कमियां हैं जिससे कि उसका पुनरावर्तन ना हो सके ।

             पति भी सहमत हो गया कि विचार तो अच्छा है । डायरियाँ आ गईं और देखते ही देखते साल बीत गया । अगले साल फिर विवाह की वर्षगांठ की पूर्वसंध्या पर दोनों साथ बैठे । एक-दूसरे की डायरियाँ लीं । पहले आप, पहले आप की मनुहार हुई । आखिर में महिला प्रथम की परिपाटी के आधार पर पत्नी की लिखी डायरी पति ने पढ़नी शुरू की ।

             पहला पन्ना, दूसरा पन्ना, तीसरा पन्ना,

           आज शादी की वर्षगांठ पर मुझे ढंग का तोहफा भी नहीं दिया । आज होटल में खाना खिलाने का वादा करके भी नहीं ले गए । आज मेरे फेवरेट हीरो की पिक्चर दिखाने के लिए कहा तो जवाब मिला बहुत थक गया हूँ । आज मेरे मायके वाले आए तो उनसे ढंग से बात नहीं की । आज बरसों बाद मेरे लिए साड़ी लाए भी तो पुराने डिजाइन की । ऐसी अनेक रोज़ की छोटी-छोटी फरियादें लिखी हुई थीं ।

             पढ़कर पति की आँखों में आँसू आ गए । पूरा पढ़कर पति ने कहा कि मुझे पता ही नहीं था मेरी गल्तियों का, किंतु फिर भी मैं ध्यान रखूँगा कि आगे से इनकी पुनरावृत्ति ना हो ।

            अब पत्नी ने पति की डायरी खोली, पहला पन्ना……… खाली, दूसरा पन्ना……… खाली,  तीसरा पन्ना ……… खाली,  अब दो-चार पन्ने साथ में पलटे तो वो भी खाली, फिर 50-100 पन्ने साथ में पलटे तो वो भी खाली ।
    
            पत्नी ने कहा कि मुझे पता था कि तुम मेरी इतनी सी इच्छा भी पूरी नहीं कर सकोगे । मैंने पूरे साल इतनी मेहनत से तुम्हारी सारी कमियां लिखीं ताकि तुम उन्हें सुधार सको और तुमसे इतना भी नहीं हुआ ।

           पति मुस्कुराया और कहा मैंने सब कुछ अंतिम पृष्ठ पर एक साथ लिख दिया है । 

            पत्नी ने उत्सुकता से अंतिम पृष्ठ खोला । उसमें लिखा था - मैं तुम्हारे मुँह पर तुम्हारी जितनी भी शिकायत कर लूँ लेकिन तुमने जो मेरे और मेरे परिवार के लिए त्याग किए हैं और इतने वर्षों में जो असीमित प्रेम दिया है, उसके सामने मैं इस डायरी में लिख सकूँ ऐसी कोई भी कमी मुझे तुममें दिखाई ही नहीं दी । ऐसा नहीं है कि तुममें कोई कमी नहीं है - लेकिन तुम्हारा प्रेम, तुम्हारा समर्पण, तुम्हारा त्याग उन सब कमियों से ऊपर है । मेरी अनगिनत अक्षम्य भूलों के बाद भी तुमने जीवन के प्रत्येक चरण में छाया बनकर मेरा साथ निभाया है । अब अपनी ही छाया में कोई दोष कैसे दिखाई दे मुझे ।

              अब रोने की बारी पत्नी की थी । उसने पति के हाथ से अपनी डायरी लेकर दोनों डायरियाँ अग्नि में स्वाहा कर दीं और साथ में सारे गिले-शिकवे भी । फिर से उनका जीवन एक नवपरिणीत युगल की भाँति प्रेम से महक उठा । जब जवानी का सूर्य अस्ताचल की ओर प्रयाण शुरू कर दे तब हम एक-दूसरे की कमियां या गल्तियां ढूँढने की बजाए अगर ये याद करें हमारे साथी ने हमारे लिए कितना त्याग किया है, उसने हमें कितना प्रेम दिया है, कैसे पग-पग पर हमारा साथ दिया है तो निश्चित ही जीवन में प्रेम फिर से पल्लवित हो जाएगा । 
For all of us.





Wednesday, June 15, 2016

कर्मसूत्र...


            कुछ समय पूर्व एक युवक ने विवाह के दो साल बाद परदेस जाकर व्यापार करने की इच्छा पिता से कही । पिता ने स्वीकृति दी तो वह अपनी गर्भवती पत्नी को माँ-बाप के जिम्मे छोड़कर व्यापार करने चला गया । 

            परदेश में मेहनत से बहुत धन कमाया और वह धनी सेठ बन गया । सत्रह वर्ष धन कमाने में बीत गए तो सन्तुष्टि हुई और वापस घर लौटने की इच्छा हुई । पत्नी को पत्र लिखकर आने की सूचना दी और जहाज में बैठ गया । उसे जहाज में एक व्यक्ति मिला जो दुखी मन से बैठा था ।

            सेठ ने उसकी उदासी का कारण पूछा तो उसने बताया कि इस देश में ज्ञान की कोई कद्र नही है । मैं यहाँ ज्ञान के सूत्र बेचने आया था पर कोई लेने को तैयार नहीं है ।

            सेठ ने सोचा 'इस देश में मैने बहुत धन कमाया है, और यह मेरी कर्मभूमि है, इसका मान रखना चाहिए !' इसलिये उसने ज्ञान के सूत्र खरीदने की इच्छा जताई ।

            उस व्यक्ति ने कहा- मेरे हर ज्ञान सूत्र की कीमत 500 स्वर्ण मुद्राएं है । सेठ को सौदा तो महंगा लग रहा था.. लेकिन कर्मभूमि का मान रखने के लिए 500 स्वर्ण मुद्राएं दे दी । व्यक्ति ने ज्ञान का पहला सूत्र दिया- कोई भी कार्य करने से पहले दो मिनट रूककर सोच लेना । सेठ ने सूत्र अपनी किताब में लिख लिया । 

            कई दिनों की यात्रा के बाद रात्रि के समय सेठ अपने नगर को पहुँचा । उसने सोचा इतने सालों बाद घर लौटा हूँ तो क्यों न चुपके से बिना खबर दिए सीधे पत्नी के पास पहुँच कर उसे आश्चर्य उपहार दूँ ।

            घर के द्वारपालों को मौन रहने का इशारा करके सीधे अपने पत्नी के कक्ष में गया । तो वहाँ का नजारा देखकर उसके पांवों के नीचे की जमीन खिसक गई । पलंग पर उसकी पत्नी के पास एक अन्जान युवक सोया हुआ था । अत्यंत क्रोध में सोचने लगा कि मैं परदेस में भी इसकी चिंता करता रहा और ये यहां अन्य पुरुष के साथ है । दोनों को जिन्दा नही छोड़ूगाँ । क्रोध में तलवार निकाल ली ।

            वार करने ही जा रहा था कि उतने में ही उसे 500 स्वर्ण मुद्राओं से प्राप्त ज्ञान सूत्र याद आया- कि कोई भी कार्य करने से पहले दो मिनट सोच लेना । सोचने के लिए रूका । तलवार पीछे खींची तो एक बर्तन से टकरा गई । बर्तन गिरा तो पत्नी की नींद खुल गई । जैसे ही उसकी नजर अपने पति पर पड़ी वह भावविव्हल हो ख़ुशी में रो पडी और बोली- आपके बिना जीवन कितना सूना था, इन्तजार में इतने वर्ष कैसे निकाले यह मैं ही जानती हूँ ।

            सेठ तो पलंग पर सोए पुरुष को देखकर कुपित था । पत्नी ने युवक को उठाने के लिए कहा- बेटा जाग । तेरे पिता आए हैं । युवक उठकर जैसे ही पिता को प्रणाम करने झुका माथे की पगड़ी गिर गई और उसके लम्बे बाल बिखर गए ।  सेठ की पत्नी ने कहा- स्वामी ये आपकी बेटी है । पिता के बिना इसके मान को कोई आंच न आए, इसलिए मैंने इसे बचपन से ही पुत्र के समान पालन पोषण और संस्कार दिए हैं ।

            यह सुनकर सेठ की आँखों से अश्रुधारा बह निकली । पत्नी और बेटी को गले लगाकर वह सोचने लगा कि यदि आज मैने उस ज्ञानसूत्र को नहीं अपनाया होता तो जल्दबाजी में कितना अनर्थ हो जाता । मेरे ही हाथों मेरा निर्दोष परिवार खत्म हो जाता ।

            ज्ञान का यह सूत्र उस दिन तो मुझे बहुत महंगा लग रहा था, लेकिन ऐसे सूत्र के लिए तो 500 स्वर्ण मुद्राएं भी बहुत कम हैं । 'ज्ञान तो वास्तव में  अनमोल है ' ।

            इस कहानी का सार यह है कि जीवन के दो मिनट जो दुःखों से बचाकर सुख की बरसात कर सकते हैं. वे हैं - शातिं के । किसी भी व्यक्ति को क्रोध अथवा जल्दबाजी के आवेश में कुछ भी कर्म करने के पूर्व इस सूत्र को अवश्य ध्यान में रखना चाहिये ।   
               

Sunday, June 12, 2016

हमारा गौरवशाली इन्दौर...


             भारत के नक्शे पर कई शहर अपनी विशेष पहचान के कारण ही जाने जाते हैं, उन्हीं में यदि रानी अहिल्याबाई व सर सेठ हुकमचंद जैसी ऐतिहासिक शख्सियतों से जुडे इन्दौर शहर की बात की जावे तो चाहे यह शहर बम्बई, दिल्ली, कलकत्ता, मद्रास जैसे देश के महानगरों सा आकार नहीं रखता हो किंतु इसकी ऐतिहासिकता के साथ ही ऐसी अनेक विशेषतायें इस शहर के साथ शुरु से जुडी रही हैं जो इसे देश के नक्शे में एक विशिष्ट स्थान दिलवाते हुए इसकी पहचान को हमेशा से एक विशेष दर्जा सदैव दिलवाती रही हैं । 

            देश के सात राज्यों से सीधे जुडे मध्यप्रदेश के भी लगभग मध्य में राज्य की औद्योगिक व व्यापारिक राजधानी का दर्जा रखने के कारण अन्य प्रांतों से आकर बसने वाली आबादी का सर्वोच्च भार वहन करने वाले इस शहर की खासियतों का यदि जिक्र करना प्रारम्भ किया जावे तो वास्तव में लेख की लम्बाई तो बढती ही चली जाएगी किंतु यहाँ की विशेष पहचान के क्रम समाप्त होते नहीं दिखेंगे । फिर भी इस क्रम में यह जानने की कोशिश करते हैं कि वे कौन-कौनसी प्रमुख विशेषताएँ हैं जो इस शहर को इसकी खासियतों के आधार पर इसे अन्यों से कुछ अलग दिखला सकने का कारण बनती हैं-

            महान क्रिकेट खिलाड़ी सुनील गावस्कर ने अपने वनडे करियर की एकमात्र सेंचुरी इंदौर के नेहरू स्टेडियम में लगाई ।

            इन्दौर स्थित सैन्य छावनी MHOW (Military Headquarters Of War) देश की मुख्य सैन्य छावनियों में शामिल है ।

            जानकारी के अनुसार इन्दौर का नामकरण इन्द्रेश्वर मंदिर के नाम पर हुआ था, शुरूआत में यह "इन्दूर" था,जो आगे चलकर "इन्दौर" कहलाया ।

            इन्दौर देश का एकमात्र शहर है जहाँ पर IIM एवं IIT दोनों है ।
 
           इन्दौर में एशिया की सबसे बड़ी रिहायशी कॉलोनी सुदामा नगर है ।

            देश के पहले निजी रेडियो चैनल "रेडियो मिर्ची" ने अपने प्रसारण की शुरुआत इन्दौर से की थी ।

            स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर, फिल्म स्टार सलमान खान, क्रिकेट खिलाड़ी राहुल द्रविड़ और परम पूज्यनीय योग गुरु श्री मनीष शर्मा की जन्मभूमि भी इन्दौर है ।

            पूर्व में इन्दौर को  "म.प्र.का डेट्रॉयट"  नाम से नवाजा जा चुका है ।

         इंदौर देश का एकमात्र ऐसा शहर है जहां 100 कि.मी. की रेंज में दो ज्योतिर्लिंग हैं-  1. ओंकारेश्वर  और  2. महाकालेश्वर ।

            इन्दौर स्थित आर आर कैट देश की मुख्य प्रयोगशालाओं में एक है । यहां एक्सलरेटर, क्रायोजेनिक्स सहित कई महत्वपूर्ण शोध हो रहे हैं ।

            टेस्ट क्रिकेट में एक टेस्ट में   सर्वाधिक विकेट लेने का  कीर्तिमान इंदौर के नरेन्द्र हिरवानी और बाब मैसी (आस्ट्रेलिया) के नाम पर संयुक्त रूप से दर्ज है । 
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            किसी महिला प्रत्याशी द्वारा एक ही लोकसभा सीट से एक ही पार्टी के टिकट पर सर्वाधिक बार चुनाव जीतने का कीर्तिमान इन्दौर की सांसद और वर्तमान लोकसभा अध्यक्ष श्रीमती सुमित्रा महाजन के नाम पर दर्ज ।

            विकास के शुरुआती वर्षों में इन्दौर "कपड़ा मिलों का शहर" के नाम से प्रसिद्ध था लेकिन अब ये सभी मिलें बंद हो चुकी है ।

            इन्दौर स्वाद के शौकीनों का शहर है । इसे "स्वाद की राजधानी" के रूप मे जाना जाता है ।

            यहाँ पर एशिया के सबसे बड़े गणपति विराजमान हैं (बड़ा गणपति)

            यहाँ पर संपूर्ण कांच से निर्मित मंदिर है । जहां पर छत, दिवार से लेकर फर्श भी कांच की है और ये सारे कांच  विदेशों से मंगाए गए थे ।

            यहीं पर ही वीरेंद्र सहवाग ने 200 रन बनाये थे ।

            यहीं के एक विधायक के नाम सबसे ज्यादा मतों से जितने का रिकार्ड है ।

            यहीं की एक बेटी पलक मुछाल ने गाने गाकर सबसे ज्यादा हार्ट सर्जरी करवाई और यह क्रम अभी तक भी सतत जारी है ।

            यहीं का एक ट्रैफिक पुलिस आज दुनिया का सबसे पसंदीदा ट्रैफिक पुलिस है । जिसे काम करते सभी देखना चाहते है । रणजीत सिंह ।

            यहाँ पर स्थित दवा बाजार एशिया का सबसे बड़ा दवा बाजार है ।

            यहीं पर एक ऐसा पर्वत है जहां पर पितरों की याद में पोधे लगाये जाते है । पितृ पर्वत ।

            यही वो शहर है जहां मूक बधिरों की सेवा के लिए सबसे अच्छा स्कूल और ट्रेनिग कैंप है ।

            यही वो शहर है जहाँ के एक व्यापारी सर सेठ हुकुमचंदजी (कॉटन किंग) की तस्वीर आज भी लंदन कॉटन एक्सचेंज में मुख्य द्वार पर लगी है ।


            यहीं पर सर सेठ हुकुम चंद जी द्वारा स्वर्ण से निर्मित रथ है जो दुनिया में कही नहीं है और वो केवल महावीर जयंती पर ही निकलता है ।

            मोबाईल कंपनी एयर टेल ने अपनी मोबाइल सेवा की शुरुवात  सर्व प्रथम इंदौर से ही की थी ।
 

            अनंत चतुर्दशी पर रात भर चलने वाले विशाल चल समारोह और रंगपंचमी पर दिन भर रंगों से सरोबार हुडदंगीयों की विशाल सामूहिक गेर जिनके फिल्मांकन के लिये राजश्री प्रॉडक्शन जैसी नामी-गिरामी फिल्म प्रोड्यूसर संस्थाएँ विशेष आयोजन रखती हैं वह भी इसी इन्दौर शहर की विशिष्ट पहचान रही है ।


और अब इन्दौर का एक परिचय यह भी...!

  
इन्दौरियों को समर्पित - जन्म दिन विश करने का तरीका...
 
हिंदी में- जन्म दिन की बहुत बहुत शुभकामनाये भाई साब.


English में:- Happy Birthday Sir.


भोपाल में- जन्मदिन मुबारक हो,


मुम्बई में- भाई को Happy बड्डे, 


            और इंदौर  में -  हमारे भाई साब,  ऊर्जावान नेतृत्व के धनी, गो-माता के रक्षक, गरीबो के मसीहा, विकासपुरुष, बालाजी महाराज के परमभक्त, यारों के यार, युवा क्रन्तिकारी, दिलफेंक दिलदार, हरफनमोला हर परिस्थितियों में दोस्तों का साथ देने वाले, चाणक्य से भी तेज बुद्धि वाले, बहुमुखी प्रतिभा के धनी, सदैव जाग्रत रहने वाले, पुरे भारत में इंदौर का नाम रोशन करने वाले, निडर समाजसेवी, बाल्यकाल से ही ऊर्जावान, संघ के निडर सिपाही, युवा नेता, प्रखर वक्ता, महाँकाल के परमभक्त, सरल ह्रदय के स्वामी, याददास्त के धनी, युवा क्रांतिकारी, गरीबी से लड़ने वाले, एक बार प्रधानमंत्री से हाथ मिलाने वाले, मुख्यमंत्री के साथ फ़ोटो खिंचाने वाले, विधायक के सीधे हाथ, मीठी चटनी में समोसा खाने वाले, एक हाथ से उज्जैन से इंदौर तक टू-व्हीलर चलाने वाले, गर्मी में छांव करने वाले, घनघोर बारिश में भी पानी बांध देने वाले, ऐसे हमारे बड़े या छोटे भाई साब को जन्मदिन की भोत-भोत शुभकामनाएं...


इन्दौर गजब है - सब से अलग है ।
 

Thursday, June 9, 2016

जिंदगी के मायने...!


           एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई । जब उसे इसका आभास हुआ तो उसने देखा कि भगवान उसके समक्ष एक सूटकेस हाथ में लिये खडे हैं और उससे कह रहे हैं - चलो मेरे बच्चे, तुम्हारा समय पूरा हो गया है ।

           व्यक्ति बोला - इतनी जल्दी ! अभी तो मेरे सामने ढेरों प्लान पूरे करने के लिये बाकि हैं ।

            भगवान बोले - नहीं, अब कुछ नहीं, तुम्हारा समय पूरा हो चुका है ।

            व्यक्ति ने पूछा - इस सूटकेस में क्या है ?

            तुम्हारी सम्पत्ति - भगवान ने जवाब दिया ।

            आपका मतलब - मेरा सामान, कपडे, पैसे ?

            नहीं, वे तो कभी तुम्हारे थे ही नहीं । वे तो यहाँ पृथ्वी पर तुम्हारा समय गुजारने के माध्यम थे ।

            इसका मतलब मेरी यादें । व्यक्ति ने पूछा ?

            नहीं । वे सब तो समयाश्रित थी । भगवान ने फिर जवाब दिया । 

            तो फिर मेरा हुनर । व्यक्ति ने फिर पूछा ?

            ना... ना... वे तो परिस्थितियों की देन थे । भगवान ने फिर जवाब दिया ।

            अच्छा तो फिर इसमें मेरे मित्र और परिजन साथ होंगे । व्यक्ति ने फिर पूछा ?

            नहीं भाई, वे तो तुम्हारी जीवन यात्रा के राही थे । भगवान बोले ।

            तो फिर मेरी पत्नी और बच्चे । व्यक्ति ने फिर पूछा ?

            नहीं, वो तो तुम्हारे दिल में थे । भगवान ने फिर उसकी जिज्ञासा का समाधान किया । 

            तो फिर जरुर इसमें मेरा शरीर होगा । व्यक्ति ने फिर पूछा ?

            कैसा शरीर ? वह तो राख की अमानत है । भगवान का फिर जवाब मिला । 

            तो निश्चय ही इसमें मेरी आत्मा होगी । बडे विश्वास के साथ उसने फिर पूछा ?

            दुःख की बात है कि यहाँ भी तुम गलत हो, तुम्हारी आत्मा तो मेरी देन रही है । भगवान ने फिर जवाब दिया । 

            तब उस व्यक्ति ने आँखों में आंसू भरकर बडे दुःखी मन से ईश्वर से उस सूटकेस को खोलकर दिखाने का अनुरोध किया । ईश्वर ने जब उस सूटकेस को खोलकर दिखाया तो वह बिल्कुल खाली था ।
 
            टूटा दिल और गिरते आंसू के साथ उस व्यक्ति ने भगवान से पूछा- तो क्या इतने वर्षों में मेरा यहाँ कभी कुछ भी नहीं रहा ? हाँ- अब तुम ठीक सोच रहे हो । ऐसा कुछ भी कभी नहीं रहा जो तुम्हारा वस्तुविशेष के रुप में गिना जा सके ।

            तो फिर आखिर इतने वर्षों में मेरा क्या रहा ?  व्यक्ति ने फिर पूछा ?
तुम्हारे कार्य ! तुम्हारे वे सभी कार्य जो तुमने यहाँ रहते किये, वे सभी सिर्फ तुम्हारे रहे हैं । भगवान ने जवाब दिया... 

            इसलिये जब तक जीवित हो - जो कुछ भी अच्छे कार्य कर सकते हो, अवश्य करो । हमेशा अच्छे कार्यों के लिये सोचो और अपने प्रत्येक कार्य के लिये ईश्वर का धन्यवाद करो ।

            हमारी जिंदगी एक सादे कागज़ के समान है, जिस पर हर इंसान को स्वयं ही चित्रकारी करनी है ।

            "ईश्वर" ने हमें हमारे 'कर्म' की 'पेंसिल' देकर हमें चित्रकारी करने की सुविधा अवश्य दी है, परंतु सदैव ध्यान रखें...

            "ईश्वर" ने हमें ऐसा कोई रबर नहीं दिया है, जिससे हम अपनी बनाई चित्रकारी को मिटा सकें ।

 

Monday, June 6, 2016

रुक जाना नहीं, तू कहीं हार के...


           एक उद्योगपति किसी अर्जेंट मिटिगं में भाग लेने जा रहे थे । राह में भयंकर तूफ़ान आया, ड्राइवर ने उनसे पूछा - अब हम क्या करें ?
            उद्योगपति ने  जवाब दिया - गाडी चलाते रहो ।

            तूफ़ान में गाडी चलाना बहुत ही मुश्किल हो रहा था व  तूफ़ान और भी भयंकर होता जा रहा था अतः ड्राइवर ने फिर पूछा- अब मैं क्या करू ? 

            गाडी चलाते रहो - उद्योगपति ने पुनः कहा ।

            थोड़ा आगे जाने पर ड्राइवर ने देखा की राह में कई वाहन तूफ़ान की वजह से रुके हुए थे... उसने फिर उद्योगपति से कहा - मुझे गाडी रोक देनी चाहिए...  मैं मुश्किल से देख पा रहा हूं । यह भयंकर स्थिति है, और प्रत्येक चालक ने अपना वाहन रोक दिया है...

            इस बार उद्योगपति ने फिर निर्देशित किया - लेकिन तुम गाडी रोकना नहीं । धीरे चले तो धीरे ही सही, किंतु चलाते रहो....

            तूफ़ान ने बहुत ही भयंकर रूप धारण कर लिया था, किन्तु ड्राइवर ने निर्देसानुसार गाडी चलाना नहीं छोड़ा, और अचानक ही उसने देखा कि कुछ-कुछ साफ़ दिखने लगा है...! चंद किलोमीटर आगे जाने के पश्चात ड्राइवर ने देखा कि तूफ़ान थम गया है और सूरज दिख रहा है ।

            तब उद्योगपति ने कहा - अब तुम गाडी रोककर बाहर आ सकते हो...!  चालक ने आश्चर्य से पूछा - पर अब क्यों ?

            उद्योगपति ने कहा - जब तुम बाहर आओगे तो देखोगे कि जो राह में रुक गए थे, वे अभी भी तूफ़ान में ही फंसे हुए हैं । किंतु तुमने गाडी  चलाने का प्रयत्न नहीं छोड़ा, तो तुम अब तूफ़ान के बाहर हो ।

            यह किस्सा उन लोगों के लिए एक प्रमाण भी है जो कठिन समय से गुजर रहे हैं । मजबूत से मजबूत इंसान भी प्रयास छोड़ देते हैं, जबकि प्रयास कभी छोड़ना नहीं चाहिए ।

            निश्चित ही जिन्दगी के कठिन समय गुजर जायेंगे और सुबह के सूरज की भांति चमक आपके जीवन में पुनः आयेगी !  ऐसा नहीं है की जिंदगी बहुत छोटी है, दरअसल हम जीना ही देर से शुरू करते हैं !

            कोहरे व तूफान से हमेशा एक अच्छी बात सीखने को मिलती है कि जीवन में जब भी रास्ता न दिख रहा हो तो बहुत दूर तक देखने की कोशिश व्यर्थ है, एक एक कदम चलते चलो, रास्ता खुलता जाएगा...!

            हौसला कायम रखना... अगर नाकामियां चरम पे हैं,  तो कामयाबी बेहद करीब होती है..!

            प्रायः कठिन समय में स्वयं को दिलासा दिलाने के हमारे आसान बहाने ये हो जाते हैं-

             1.  मुझे उचित शिक्षा लेने का अवसर नही मिला.     जबकि...
                उचित शिक्षा का  अवसर फोर्ड मोटर्स के मालिक हेनरी फोर्ड को भी नही मिला ।

            2.  मै इतनी बार हार चूका, अब हिम्मत नही.   
जबकि... 
               अब्राहम लिंकन 15 बार चुनाव हारने के बाद राष्ट्रपति बने ।

            3.  मै अत्यंत गरीब घर से हूँ.    
जबकि...
              पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम भी गरीब घर से थे ।

            4.  बचपन से ही अस्वस्थ था.    
जबकि...
               ऑस्कर विजेता अभिनेत्री मरली मेटलिन भी बचपन से बहरी व अस्वस्थ थी ।

            5.   मैने साइकिल पर घूमकर आधी ज़िंदगी गुजारी है.    
जबकि...
                निरमा के करसन भाई पटेल ने भी साइकिल पर निरमा बेचकर आधी ज़िंदगी गुजारी ।

           6.   एक दुर्घटना मे अपाहिज होने के बाद मेरी हिम्मत चली गयी...
जबकि...
               प्रख्यात नृत्यांगना सुधा चन्द्रन के पैर नकली है ।

            7.  मुझे बचपन से मंद बुद्धि कहा जाता है.      जबकि...
               थामस अल्वा एडीसन को भी बचपन से मंदबुद्धि कहा जता था ।

           
8.   बचपन मे ही मेरे पिता का देहाँत हो गया था.     जबकि...
              प्रख्यात संगीतकार ए.आर.रहमान के पिता का भी देहांत बचपन मे हो गया था ।

           
9.  मुझे बचपन से परिवार की जिम्मेदारी उठानी पङी.     जबकि...
               लता मंगेशकर को भी बचपन से परिवार की जिम्मेदारी उठानी पङी थी।

           
10. मेरी लंबाई बहुत कम है.     जबकि...
                 सचिन तेंदुलकर की भी लंबाई कम है।

           
11.  मै एक छोटी सी नौकरी करता हूँ, इससे क्या होगा.    जबकि...
                 धीरुभाई अंबानी भी छोटी नौकरी करते थे ।


            12. मेरी कम्पनी एक बार दिवालिया हो चुकी है, अब मुझ पर कौन भरोसा करेगा.     जबकि...
             दुनिया की सबसे बङी शीतल पेय निर्माता पेप्सी कोला भी दो बार दिवालिया हो चुकी है ।

          
13.  मेरा दो बार नर्वस ब्रेकडाउन हो चुका है, अब क्या कर पाउँगा.     जबकि...
                डिज्नीलैंड बनाने के पहले वाल्ट डिज्नी का तीन बार नर्वस ब्रेकडाउन हुआ था ।

           
14.  मेरी उम्र बहुत ज्यादा है.      जबकि...
                विश्व प्रसिद्ध केंटुकी फ्राइड चिकेन के मालिक ने 60 साल की उम्र मे पहला रेस्तरा खोला था ।

           
15.  मेरे पास बहुमूल्य आइडिया है पर लोग अस्वीकार कर देते है.      जबकि...
             जेराँक्स फोटो कापी मशीन के आईडिया को भी ढेरो कंपनियो ने अस्वीकार किया था पर आज परिणाम सामने है ।

           
16.   मेरे पास धन नही.      जबकि...
                  इन्फोसिस के पूर्व चेयरमैन नारायणमूर्ति के पास भी धन नही था उन्हे अपनी पत्नी के गहने बेचने पङे ।

          
17.   मुझे ढेरो बीमारियां है.     जबकि...
                वर्जिन एयरलाइंस के प्रमुख भी अनेको बीमारियो मे थे । राष्ट्रपति रुजवेल्ट के दोनो पैर काम नही करते थे ।

            तात्पर्य यह कि -
आज आप जहाँ भी है, या कल जहाँ भी होगे, इसके लिए आप किसी और को जिम्मेदार नही ठहरा सकते ।


            इसलिए
चुनाव आज ही कीजिये- 
                           सफलता और सपने चाहिए या खोखले बहाने...


भाग्य को या किसी और को दोष क्यों देना ?
यदि सपने हमारे हैं तो,
प्रयास भी हमारे ही होने चाहिये ।

Friday, June 3, 2016

जंजाल जिन्दगी के...

            वर्तमान प्रतिस्पर्धी युग में एक ओर निरन्तर बढती मँहगाई, दूसरों को स्वयं से ज्यादा कमाते हुए देखना, खुद अपनी आय नहीं बढा पाना, परिवारजनों के लिये सब कुछ करते रहने के बावजूद उनके द्वारा स्वयं की मौके-बेमौके अवहेलना भी झेलना और ऐसे ही अनेकों ज्ञात-अज्ञात अवसरों पर प्रसन्नता के लिये निरन्तर प्रयत्नशील रहने के बावजूद किसी भी प्रकार की प्रसन्नता से कोसों दूर रह जाना जैसी थोक में समस्याएँ आज हममें से लगभग हर किसी को किसी न किसी बदले हुए स्वरुप में निरन्तर झेलते हुए अपनी जिन्दगी बिताना पड रही है ।

            परिणामतः हर समय खिन्न व उद्विग्न रहना, क्या करना ?  कैसे करना ? जिससे कि न सिर्फ स्वयं के जीवन में बल्कि परिवारजनों में भी सन्तुष्टि का लेवल कुछ बढाया जा सके जैसी अगनित समस्याओं के दबाव में नाना प्रकार की छोटी-मोटी बीमारियों को भी अपने गले ओढ लेने के बाद भी जी के जंजाल जैसी दिखाई पडने वाली इन समस्याओं के बीच प्रसन्नता के वास्तविक पल कैसे निकाले जा सकें, इस चिंतन का थोडा सा समाधान इस जानी-पहचानी कहानी में थोडा-बहुत दिखाई देने के कारण यह कथासार आपके साथ इस पोस्ट के द्वारा शेअर करने का प्रयास किया है । आईये पहले इस कथा को ही एक बार फिर से अपने मस्तिष्क में रिवाईज करलें-
            किसी  शहर  में, एक आदमी प्राइवेट  कंपनी  में  जॉब  करता था, वो  अपनी  ज़िन्दगी  से  कतई खुश  नहीं  था, हर  समय  वो  किसी  न  किसी  समस्या  से  परेशान  रहता  था ।

            एक बार  शहर  से  कुछ  दूरी  पर  एक  महात्मा  का  काफिला  रुका,  शहर  में  चारों  और  उन्ही की चर्चा चलते हुए दिख रही थी ।  बहुत  से  लोग  अपनी  समस्याएं  लेकर  उनके  पास  पहुँचने  लगे ।

            उस आदमी  ने  भी  महात्मा  के  दर्शन  करने  का  निश्चय  किया - और छुट्टी के दिन सुबह-सुबह ही उनके  काफिले  तक  पहुंचा । बहुत इंतज़ार  के  बाद उसका  का  नंबर  आया...
            वह  बाबा  से  बोला - ”बाबा, मैं  अपने  जीवन  से  बहुत  दुःखी  हूँ,  हर  समय ढेरों समस्याएं  मुझे  घेरें  रहती  हैं, कभी ऑफिस  की  टेंशन  रहती  है, तो  कभी  घर  पर  अनबन  हो  जाती  है, और  कभी  अपने  सेहत  को  लेकर  परेशान रहता  हूँ….

            बाबा  कोई  ऐसा  उपाय  बताइये  कि  मेरे  जीवन  से  सभी  समस्याएं  ख़त्म  हो  जाएं  और  मैं  चैन  से  जी सकूँ  ?

            बाबा  मुस्कुराये  और  बोले,  “पुत्र, आज तो बहुत देर  हो  गयी  है, मैं  तुम्हारे  प्रश्न  का  उत्तर  कल  सुबह दे सकूंगा । लेकिन क्या  तब तक तुम  मेरा  एक  छोटा  सा  काम  कर सकोगे ?”

            जी बाबा । उस आदमी ने महात्मा को जवाब दिया ।

            “हमारे  काफिले  में  सौ ऊंट हैं, मैं  चाहता हूँ  कि  आज  रात  तुम  इनका  खयाल  रख लो । जब ये सौ  के  सौ  ऊंट बैठ जाएं तो तुम भी सो जाना” ।

            ऐसा कहते  हुए महात्मा अपने तम्बू  में  चले  गए ।

            अगली सुबह जब महात्मा उस आदमी  से  मिले और उससे पुछा,  “कहो बेटा, रात नींद अच्छी आई ?”

            तो वो दुखी होते हुए बोला - “कहाँ बाबा, मैं तो एक पल के लिये भी नहीं सो पाया  । मैंने  बहुत  कोशिश  की  पर  मैं  सभी  ऊंटों को  नहीं  बैठा  पाया, कोई  न  कोई  ऊंट  खड़ा  हो  ही  जाता ।

           

            तब बाबा बोले,  “बेटा, कल  रात  तुमने  अनुभव  किया कि  चाहे  कितनी  भी  कोशिश  कर  लो  सारे  ऊंट  एक  साथ  बैठ ही नहीं सकते । तुम  एक  को  बैठाओगे  तो  कहीं  और  कोई  दूसरा  खड़ा  हो  जाएगा ।

            बस इसी  तरह तुम एक समस्या का समाधान  करोगे तो किसी कारणवश दूसरी खड़ी हो  जाएगी । जब तक जीवन है, ये समस्याएं तो  बनी  ही  रहती हैं, कभी  कम  तो  कभी  ज्यादा….”

            “तो  हमें  क्या  करना चाहिए ?”  उस आदमी  ने  जिज्ञासावश  पुछा । “इन  समस्याओं  के  बावजूद  जीवन  का  आनंद  लेना  सीखो…" 
            कल  रात  क्या  हुआ ? कई  ऊंट  रात होते-होते  खुद ही  बैठ  गए, कई  तुमने  अपने  प्रयास  से  बैठा  दिए, और बहुत  से  ऊंट तुम्हारे लगातार प्रयास  के  बाद  भी  नहीं बैठे । जबकि बाद  में  तुमने  पाया  कि उनमे से कुछ खुद ही  बैठ  गए…. कुछ  समझे …? 

            समस्याएं  भी  ऐसी  ही  होती  हैं - कुछ  तो  अपने आप ही ख़त्म  हो  जाती हैं,  कुछ  को  तुम  अपने  प्रयास  से  हल  कर लेते  हो, और कुछ  तुम्हारे  बहुत  कोशिश  करने  पर   भी  हल  नहीं  होतीं, ऐसी समस्याओं को समय के भरोसे पर  छोड़  दो । उचित  समय आने पर वे खुद ही ख़त्म हो  जाएंगी ।

            जीवन है, तो कुछ समस्याएं तो रहेंगी ही । पर  इसका  ये  मतलब  नहीं  की तुम  दिन  रात उन्ही  के  बारे  में  सोचते  रहो, समस्याओं को एक तरफ  रखो और  जीवन  का  आनंद  लो… चैन की नींद सोओ । जब भी उनका  समय  आएगा, तब वो  खुद  ही हल हो जाएँगी" ।